असली ख़ुशी
सत्य घटना पर आधारित
असली ख़ुशी
वातावरण बहुत ही शोर
गुल भरा लेकिन मन मोहक था , और अपनी और सबका ध्यान आकर्षित करने वाला था ..चारों
तरफ लोगों की भीड़ का रेला उस बड़े से मैदान के अंदर इधर से उधर और फिर उधर से इधर मंडरा
रहा था .. किशोर युवा युवतियों की तादात कुछ ज्यादा नजर आ रही थी .. जिनमे कुछ जोड़े में , जो की बहुत खुश
और संतुष्ट प्रतीत हो रहे थे और कुछ अकेले ही अपनी किस्मत को कोसे हुए इधर से उधर
जोगियों की भाँती विचरण कर रहे थे....| कुछ लोगों ने अपने छोटे बच्चों के हाथ इस कारण से पकडे हुये थी की कहीं
ये चिल्लर अगर खो गए भीड़ में तो सारा का सारा
मजा धरा रह जायेगा....
लोगों की इस भीड़ के
बीच में जहाँ पर भी खाली जगह मौजूद थी वो जगह चरखियों जिनमे की कुछ बड़ी चरखियां और
कुछ छोटी , कुछ जनरेटर द्वारा चालू थी तो कुछ के लिए उस चरखे वाले के बल की जरुरत
पड रही थी. और अस्थाई दुकानों ने घेर रखी थी,.
जो की टेंट और बांस की बल्लियों या फिर टीन की चादरों से निर्मित थी.....
कुछ दुकाने कपड़ों
लत्तों से भरी हुई थी तो कुछ खाने पीने की चीजों से जिन्हें की लोगों ने मधुमख्खी
के छत्ते की भाँती घेरे हुवे था ...वहीँ थोड़ी दूर मौत के कुवें से एक बाइक के फटे
हुवे सैलेंसेर की आवाज ने पुरे वातावरण
में हाहाकार मचा रखा था . जो की मैदान के दाहिने तरफ के किनारे से आ रही थी , कुछ लोग नजारा देखने के लिए कुवें के ऊपर बने
झरोखे से खेल का दृश्य निहार रहे थे तो कुछ अपनी बारी के इन्तजार में टिकेट की
कतार में खड़े हुवे थे .....
इन्ही सब झिलमिल
नजारों से अलग एक लड़का जिसकी उम्र लगभग 10 से 12 साल ,रंग सांवला , शरीर पर मैले
कुचले से लत्ते, बाल उलझे और रूखे हुए , पैरों में टूटी हुई चपल्लें लेकिन आँखों
में अजीब सा तेज .....न जाने कब से उस मेले में हो रही सभी गतिविधियों को बहुत देर
से लालायित होकर प्यासी नजरों से निहार रहा रहा था ... शायद वह कोई मेले में भीख
मांगने हेतु बाहर से आये हुए कुछ लोगों में से ही एक था ... जिसका अपने परिवार का
न जाने कब से कोई अता पता नहीं था ,, हो सकता है की वह परिवार विहीन कोई लावारिस
ही हो...उसका ध्यान लोगों से पैसे मांगने में कम और वहां लगी चरखियों, झूलो, और
खाने पीने की चीजों में ज्यादा था ....शायद उसके मन में भी इन सभी का सुख भोगने की
प्रबल इच्छा उत्पन्न हो रही थी ,,,लेकिन वह मजबूर था इन सब सुखों को पाने के लिए
...इसीलिए की उसके पास इन सब के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे ....और सुख अगर
सांसारिक हों तो उसके लिए धन होना तो बहुत ही जरुरी होता है ..... उसकी आँखों में
वह सुख पाने की लालसा साफ़ नजर आ रही थी , जो की उस समय बहुत तीव्र हो जाती जब उसकी
नजर उसकी ही उम्र के बच्चों पर पड़ती जो की झूलों , चरखियों , खिलोनों और भिन्न
भिन्न प्रकार के लजीज पकवानों के लुत्फ़ ले रहे रहे थे , वो भी सिर्फ इसलिए क्यूँ
की उनके साथ उनके मात पिता ,भाई बहन या फिर परिवार का कोई और सदस्य उनकी ये सब
जरूरतें पूरी करने के लिए वहां मौजूद था ... लेकिन उस अभागे लड़के के साथ उसे सहारा
देने के लिए कोई वहां मौजूद नहीं था.....
वहां चमकती रंगीन
रौशनी का प्रतिबिम्ब उसकी आँखों में साफ़ साफ़ दिख रहा था लेकिन वो चाह कर भी उसे
अपनी आँखों में नहीं कैद कर सकता था .....उसके हाथ खाली लेकिन मन बहुत लालायित था
....शायद कही न कहीं वो जरुर सोच रहा था की अगर उसका भी कोई होता तो उसे इन सबके लिए तरसना नही पड़ता .....खैर नियति कुछ
और ही थी…..…..
जब भी वह किसी को नए
कपडे खरीदते हुवे देखता तो वह खुश हो जाता लेकिन फिर जेसे ही उसका ध्यान अपने शरीर
पर लिपटे कुचेले कपड़ों की तरफ जाता तो वह फिर से निराश हो जाता , उसी तरह खाने की
चीज देखकर उसके मुह में पानी आता लेकिन परिस्थितिवश उसे उसी पानी के सूखे घूंट
पीने पड़ते , हमउम्र के बच्चों को चरखियों में झूलते वक़्त उसके भी पुरे शरीर में
सिहरन पैदा होती लेकिन तुरंत अस्तित्व में आते ही वह सिहरन मायूसी में बदल
जाती..... लाचारी उसके सर से लेकर पैर तक बखूभी झलक रही थी .... उस समय वह जरुर
अपनी हालत को कोस रहा होगा जिसने उसे इन सभी से महरूम रखा हुवा था.... वह अपने
बचपन की चाहतों और ख्वाइशों को अपने सीने में न जाने कब से ऐसे ही दफ्न किये हुवे
था.....और न जाने कब तक ऐसे ही दफ्न रखना पड़ेगा आगे भी ......
लेकिन उस भीड़ में दो
आँखें ऐसी भी थी जो कब से उसी लड़के को देखे जा रही थी ...उसके अंदर के कोतुहल को
वह आँखे बहुत देर से भांप रही थी ..उस चाहत को उस लालसा भरी निगाहों को .....
यह सब देखने के बाद
वह उस लड़के के पास आया और उसे उसकी पीठ की तरफ से कंधो को छुवा , जिसके एहसास से लड़का
पीछे मुड गया और उसने तुरंत खड़े होकर कहा .... जी अंकल जी ..... यह कहते हुवे उसके अंदर एक उत्सुकता दिखी ...
उस आदमी ने उस लड़के से पूछा ... बेटा चरखी में बठोगे?..... यह सुनते ही
पहले तो लड़के को आश्चर्य हुवा फिर उसने थोडा मुस्कुराते हुवे कहा .. जी अंकल जी...लेकिन मेरे पास पैसे तो
हैं ही नहीं ....... यह सुनकर वह आदमी थोडा मुस्कुराया और प्यार से उस लड़के के
सर पर हाथ फेरते हुए कहा ... बेटा पैसे किसने मांगे तुमसे ... बस तुम एक बार
हाँ तो बोलो ..... यह सुनते ही लड़के ने तपाक से सर हिलाते हुवे हाँ बोल दिया
.... अब उसके चेहरे के भाव बदल चुके थे ,,, मायूसी की जगह मुस्कराहट ने ले ली थी
... दिल के खालीपन को अचानक आई ख़ुशी ने भर दिया .. वेसे एक बच्चे की ख़ुशी होती ही
क्या है ... खेल खिलोने और किताबें बस.....
फिर उस आदमी ने उस
लड़के का हाथ पकड़ा और अपने साथ चलने को कहा , उसने लड़के से पूछा की सबसे पहले वह
क्या करना चाहेगा??? लड़का समझ नहीं पा रहा था की क्या करे और क्या न करे ... उसकी
स्थिति ऐसे थी की जेसे किसी गरीब को खजाने से भरे एक कमरे में छोड़ दिया हो ओर कह
दिया हो की पहले क्या उठाओगे ? जबकि उसे तो सारी की सारी चीजें हि अजीज हैं ....
बस यही हालत उस लड़के की थी ....उसने चारों तरफ देखा और उसकी नजर एक नाव वाले झूले
पे आ कर रुकी ...तो वह तपाक से उस झूले की और इशारा करते हुवे बोला .. अंकल उस
झूले पे बैठना है ... वह आदमी
मुस्कुराया और उसका हाथ पकड़ के वहां उस झूले के पास उसे खड़ा कर के टिकेट कटाने लगा
उसका ...और फिर उसे उस झूले पे बिठाया ... झुला झूलते हुवे वह लड़का बहुत खुश हो
रहा था , एक बड़ी सी मुस्कराहट उसके चेहरे पर खिलखिला रही थी..झुला झूलते हुवे वह
अपने चारों और के नज़ारे को बड़ी खूबसूरती से निहार रहा था .. अब उसे ऊँचाइयों में पहुँच कर वह सब दिख रहा था
जो उसे जमीन पे रहकर नहीं दिख रहा था , वह खुद को आसमान में उड़ता हुवा महसूस कर
रहा था ..उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न था ...... और नीचे खड़ा वह आदमी लगातार उसकी ही
तरफ देखे जा रहा था .. उसे लड़के की ख़ुशी देखकर बहुत सुकून मिल रहा था ... वैसे किसी के चेहरे पर ख़ुशी लाना कोई बहुत
बड़ा काम नहीं होता लेकिन वो ख़ुशी लाने का जज्बा और हिम्मत होना बहुत बड़ी बात होती
है ... नीचे खडा वह आदमी उस लड़के की ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी महसूस कर रहा था और खुद
पे गर्व कर रहा था यह सोचकर की वह किसी मायूस चेहरे पर ख़ुशी लाने में कामयाब तो
रहा ....
कुछ देर बाद झूला
धीरे होते हुए पूरी तरह रुक गया और वह लड़का वहां से निचे उतरा और उस आदमी के पास
आके बोला .. अंकल सच में बड़ा मजा आया ..... फिर उस आदमी ने पूछा ..अब
बताओ अब क्या मन है तुम्हारा ??? अब लड़का थोडा बहुत खुल चुका था उस आदमी के
साथ , तो धड़ल्ले से बोला .. अंकल अब मुझे उस बड़ी वाली चरखी में बैठना
है... उस लड़के को अपना सपना पूरा करने
का एक जरिया मिल गया था इसलिए अब वह बोलते हुवे संकुचित नहीं हो रहा था ... फिर
उसने बड़ी चरखी का भी खूब आनंद लिया .. फिर एक एक करके लगभग सभी झूले और चरखियों का
स्वाद चखने के बाद उसे थोडा भूख का एहसास हुवा तो उसने कुछ खाने की इच्छा जताई
.. वह आदमी उसे खाने के स्टाल की और ले
जाने लगा .. वह लड़का खुशी से उछलता कूदता हुवा हुवा उस आदमी के साथ बड़े मजे से जा
रहा था ..उसे किसी का हाथ जो मिल गया था ,, भले ही कुछ समय के लिए .. वह लड़का उस
पल को जी भर कर जी लेना चाहता था .... और वह आदमी उसकी इस ख़ुशी में कोई कसर नहीं
छोड़ रहा था... वह उस लड़के की सभी मांग
पूरी कर रहा था ... झुला ,चरखी, खाना, खिलौना, सब उसने उसके लिए खरीदे और कुछ नए कपडे और
जूते भी खरीद लिए थे ....कुछ देर बाद जब लड़का सभी चीजों से तृप्त हो गया तो उसने
उस आदमी का हाथ पकड़ा और कहा.... अंकल जी थैंक यू.... आप बहुत अच्छे हो ... बस इतना ही कहा उस लड़के ने और यह कहते हुवे उसकी
आँखें थोड़ी नम थी , लेकिन होंठो पे बड़ी सी मुस्कराहट ..... और वो लड़का वहां से
उछलते कूदते हुवे वहां से न जाने फिर कहाँ चला गया |
खुश नसीब हैं वो जो
अपने सारे ख्वाब पूरे करने के लिए खुद सक्षम हैं ..... लेकिन असली ख़ुशी तो तब है
जब हम किसी मजबूर ,लाचार के चेहरे पर थोड़ी सी ख़ुशी लाने का कारण बनें , भले ही वह
क्षण भर की ही क्यों न हो......
रचना :: दीपक नौटियाल



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