प्रसिद्ध ग्राम के क़िस्से : पागल लंगूर (2)
कहानी का भाग एक यहाँ पढ़ें
वर्ष 2000 की बात है ।
गंगा नदी के किनारे बसे होने के कारण प्रसिद्ध नगर कई धर्मार्थ आश्रमों से घिरा हुआ है। सभी आश्रम दान से चलते हैं और बदले मे धर्मार्थ एवं सामाजिक कार्यों मे लगे रहते हैं।
45 साल का सुरेंद्र (सुरेनदर) अपनी पत्नी और चार बच्चों ( 3 लड़कियाँ और 1 लड़का ) के साथ प्रसिद्ध ग्राम के आश्रम मे ही झुग्गी वाले इलाक़े मे रहता है । हाथ वाली ठेला गाड़ी चलता है और सामान ढोने का काम करता है । पर्यटकों के लिए प्रसिद्ध ग्राम मे रेस्तराँ की भरमार है । भट्टी के लिए सुखी लकड़ियों की काफ़ी खपत है यहाँ। सुरेनदर जंगल से सुखी लकड़ियाँ लेकर कुछ रेस्तराँ को भी बेचा करता है ।
इस बार गर्मियों मे पर्यटकों की संख्या पिछले साल से अधिक है। पता नहीं लोग गर्मियों मे यहाँ क्यों आते हैं। यहाँ भी बहुत गर्मी पड़ती है मई जून के समय। गंगा स्नान के लिए आते हैं शायद। इस बार खपत ज़्यादा होने का अनुमान है। इस बार अच्छे पैसे मिल जाएँगे लकड़ी बेच कर। लड़के ने कूलर लाने की ज़िद्द पाल रखी है। कह रहा था डेढ़ दो हज़ार मे आ जाएगा। इस बार कमाई भी अच्छी हुई है। शायद अब की गर्मियों मे कूलर आ ही जाएगा।
सर पर लकड़ियों का गठ्ठा लिए सुरेनदर यह सब कुछ सोच रहा है। आज वह जंगल मे दूर तक चला गया लकड़ियाँ लेने। आते समय कई बार वह गठ्ठे को नीचे रखकर सुस्ताता। काफ़ी देर तक चलते चलते अब वह ग्राम की सीमा दीवार तक पहुँच गया है। उसने एक बार फिर से दीवार के पास लकड़ियों के गठ्ठे को नीचे रखा और वहीं अंदर जाने वाले संकरे रास्ते पर दीवार की आढ मे बोझ के थकान को कम करने लगा।
अभी कुछ ही पल बीते की वह देखता है की दूर से एक लंगूर तेज़ी से उसी की तरफ़ भागता हुआ आ रहा है। वह कुछ सोच पता इससे पहले लंगूर पास पहुँच जाता है। वह बचने के लिए पीछे मुड़कर वापस जंगल की तरफ़ भागने की कोशिश करता है। इतने मे उसकी पीठ पर एक ज़ोरदार धक्का लगता है और वह पेट के बल ज़मीन पर गिर पड़ता है। कुछ पल के लिए उसकी आँखो के आगे अंधेरा छा गया।आँखे खुली तो देखा नाक और सर से खून बह रहा है। पास मे दिवार की दूसरी तरफ़ एक दुकान ने काम करने वाले 2 लड़के भाग कर सुरेनदर की तरफ़ भागते है और उसको ज़मीन से उठते हैं। इतने मे कुछ लोग और वह जमा हो जाते हैं।
सत्यानाश हो इस लंगूर का.. पागल हो गया है लगता है.. ये जगह इंसानो से कम और बंदर लंगूरो से ज़्यादा भारी है.. कितना खून निकल रहा है.. सुरेनदर लंगूर की तरफ़ देख कर बड़बड़ा रहा है।
अरे लगता है सर फट गया है। इनको अस्पताल लेकर जाना चाहिए। नहीं तो खून रुकेगा नहीं.. वहाँ पर खड़े एक लड़के ने सलाह दी।
सुरेनदर को पास के ही धर्मार्थ अस्पताल मे लाया जाता है। वहाँ के डॉक्टर रतन सिंह सुरेनदर का प्राथमिक जाँच और उपचार कर देते है।
अरे सुरेनदर कहा जंगल मे बंदरो के साथ कुश्ती कर रहा था। नाक तो ठीक है पर सर पर लगी चोट गहरी है। इस पर तो 5-6 टाँके लगेंगे कम से कम। यहाँ तो इसकी व्यवस्था है नहीं। एक काम करना नदी पार सरकारी अस्पताल है वहाँ चले जाना। वो लगा देंगे।
डॉक्टर साब बंदर कहा था लंगूर था। वो भी पागल। ज़ोर से मेरे ऊपर कूद गया और मुझे पूरी ताक़त से ज़मीन पर पटक दिया। दर्द बहुत हो रहा है चक्कर भी आ रहे हैं।
इतना कह के सुरेनदर वही बेहोश हो जाता है।
आँख खुलती है तो अपने आप को शहर के एक निजी अस्पताल मे पाता है। उसके सर पर 8 टाँके लगे हुए है। सामने दुकान पर काम करने वाले वही दो लड़के खड़े हैं।
अरे तुम दोनो मुझे यह क्यों लाये। सरकारी अस्पताल मे लेकर जाते।
उनमे से एक लड़का- तुम बेहोश हो गए थे। अब जो अस्पताल पहले पड़ा वही ले आये। ये तुम्हारी दवाइयाँ हैं। और ये मल्हम है। लगते रहना। अब हम चलते हैं बहुत देर हो गयी दुकान छोड़े।
दोनो लड़के सुरेनदर को दवाइयाँ, पर्चे, रसीद थमाते हैं और चले जाते हैं। सुरेनदर भी अस्पताल का भुगतान दो हज़ार रुपए चुकता करता है और धीमे धीमे घर की तरफ़ चल पड़ता है।
अब उसके लड़के को एक और साल इंतज़ार करना है..
कूलर के लिए..
अगली किस्त जल्द ही..



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