अकेला चल रहा हूँ मैं

     

अकेला चल रहा हूँ मैं , इन खाली राहों में
भुलाता मिटाता उन पलछीनो को , जो बीते थे तेरी बाहों में ...
अकेला चल रहा हूँ मैं.....

 वो दर मिले तो पूछूँगा , 
कि क्या थी कमी मेरी चाहत में
दुवाओं में उसको ही मांगा था, 
खता क्या रही थी इबादत में
गिरता , संभलता चला जा रहा हूँ , मैं इन दशों दिशाओं में...
अकेला चल रहा हूं मैं....

आँखों मे रहती थी तस्वीर बनके,
धड़कता था सीने में बन के तू धड़कन
ख्वाब और हकीकत में रहती थी हरदम ,
बसती थी मेरे तन और मन मे
कहाँ खो गयी तू बिछड़ के मुझसे  , तलाशूं कहकशाओं में....
अकेला चल रहा हूँ..मैं.....

मुरझा रहा हूँ मैं विरहा तपन में ,
सावन की बूंदों का अब है सहारा,,
घिरा हूं मैं कशमोकश के भंवर में,,
दिखा जा मुझको तु बस एक किनारा
घुली है फिजाओं में तेरी हि खुशबू,,
महसूस होती हवावों में....
अकेला चल रहा हूँ मैं ,, इन खाली राहों में......

दीपक नौटियाल ©®

Comments

Deepak Nautiyal said…
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