शिमला का अनोखा सफर....



Based on True story year 2007






कॉलेज के सेकंड इयर में एक बार यूँ ही मन बना घुमने का मेरे अपने बदमाश ग्रुप  (किंशुक वीरू  गज्जू और मै दीपक)  का वो भी कहाँ शिमला ।। और जेब में एक फूटी कोडी भी नही थी , 

किसी तरह घर में एजुकेशनल टूर के नाम से झूठ बोलकर पैसे मांगे 1000₹ मात्र।।  

अब जेब में 1000₹ और मंजिल थी शिमला।।

 बस फिर होना क्या था चल पड़े ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से जम्मू तवी एक्सप्रेस पे सवार हो के। 

 रात को पता नही था की उतरना कहाँ है ,    लोगों से पूछा तो पता चला अम्बाला शहर उतरना है । अम्बाला कैंट पे गाडी रुकी तो हम लोग इस उतरने लगे तभी एक सरदार जी ने कहा की आगे शहर में उतरना वहां से ठीक पड़ेगा,  


हम शहर का इन्तजार करने लगे और हुवा यूँ की गाडी शहर में रुकी ही नही हम सबने उस सरदार जी की और घूर गुस्से से देखा और चलती ट्रेन से कूद पड़े , 


स्पीड धीरे थी इसलिए कोई ज्यादा परेशानी नही हुई ।। किसी तरह रात को भटकते हुए एक रिक्सा मिला समय था रात के लगभग 12 बजे , 


लेकिन बड़ी मिन्नतें करने के बाद भी उस ने हमे नही बिठाया।। 


फिर से वही रात की सैर शुरू हो गई पैदल ।। भूख भी लगने लगी थी इतनी जद्दो जहद के बाद तो भूख लाजमी थी ही ,  


एक ढाबा दिखा सडक के किनारे तो राहत महसूस हुई और रोब में आकर दे डाला आर्डर शाही पनीर कढ़ाई चिकन , पर खोदा पहाड़ निकली चुहिया ।।. 


  ऐसा लग रहा था जेसे की पनीर और चिकन सीमेंट की ग्रेवी में पकाया गया हो ।।


किसी तरह थोडा सा सीमेंट का घोल पिया और निकल पड़े मंजिल की और और भटकते भटकते पहुंचे बस स्टैंड की दहलीज पे  रात के 2 बजे , नींद हावी हो रही थी  आँखें 10 किलो का वजन महसूस कर रही थी , तभी किंशुक चिल्लाया ओये रेंचो  वीरू देख बस आ रही है, 


जेसे ही मैंने सर उठाया तो सामने हरी और सफ़ेद रंग की बस शान से आ रही थी हमारी तरफ और उस पे लिखा था "शिमला" ।। आअह्ह्ह्ह्ह्ह।। 



  बड़ी राहत  मिली लगा जेसे की एक बेरोजगार को सालों बाद नोकरी मिली हो। बस नींद  खुली बस में चढ़े  टिकक कटाया शिमला का और निकल पड़े रात के अँधेरे में शिमला का सूरज देखने ।।।।।  


रात को बस में चढ़ते ही ऐसी नींद आई जेसे की सारे सपने आज ही देख लेंगे , 

अचानक कनडकटर चिल्लाया शिमला.. शिमला... और तभी नींद खुली ओर आँखे खुलते ही जो नजारा सामने थे लगा की सीधे स्वर्ग पहुंच गये हों ।

सूरज पहाड़ के पीछे से रौशनी की छटा बिखेर रहा था और किरण सीधा आँखों में पड रही थी ,   चारों और हरियाली और टीन की छत वाले भवन दिख रहे थे सच में लग रहा था जेसे की एक सपने से बाहर आके दुसरे सपने में चले गए हों।



बस रुकी तो नीचे उतर आए और शिमला की जमीं पर कदम रखा , आसपास का नजारा निहार ही रहे थे तभी पीछे से आवाज आई ..        साब जी ओ भाई साब जी .....कोई होटल ले चलू?? …


सस्ता और अच्छे होटल ले चलूँगा आप बोलो तो हर होटल की सुविधा है हमारे पास....          उसकी आवाज सुन के एसा लग रहा था जेसे की हरिद्वाए के बस स्टैंड पे आ गए हों और कोई रिक्सा वाला चिल्ला रहा हो..उफ्फ्फ...।

 किसी तरह उस से पीछा छुड़ाया और चल पड़े आगे फिर से तभी वैसे ही घटना दोहराई होटल वाली...  हमने सोंचा भाई कोई न कोई होटल तो लेना ही पड़ेगा  लेकिन अपने बजट के हिसाब से , और हमने धीरे से लज्जित होते हुए पूछा...भाई कोई सस्ता सा होटल ले चलो.... उसने कहा साब बहुत सस्ते होटल में ले चलता हूँ ... 


एसा कहते हुए उसने हमारा बाबाओं वाला जेसे झोला उठाया और चल पड़ा ....

  . होटल पहुँचते ही देखा की साला इसने तो उल्लू बनाया ये तो बड़ा और महंगा होटल लगता है... इज्जत पे बन आई थी तो अंदर चलना ही पड़ा ...     

सीधे reception पे एक बन्दा था किंशु और सुरेश  उस से भाई बंदी कर के एक कमरे की बात करने की कोशिश  करने लगे लेकिन वो नही माना ,ओर कहने लगा . ... भाई साहब आप तो चार लोग हो और आपको तो दो कमरे लेने   ही पड़ेंगे .....


....... लो साला ,, इसे कहते हैं कंगाली में आटा गीला......चलो आखिर कोई रास्ता न दिखने की हालत में हमको दो कमरे जबरदस्ती लेंने ही पड़े .....लगभग सात सौ रुपये खर्च करने पड़े थे हमे इसके लिके ।

 रूम तो दो थे पर डाका एक ही रूम पे डाल दिया दूसरा रूम केवल संडास और गुश्ल्खाने के रूप में ही प्रयोग किया।।। 

थक बहुत लग गयी थी रात भर के जद्दो जहद से तो थोडा देर नींद लेने का फैसला किया और टांग पसार के सो गए।


थोड़ी देर सोने के बाद हम फिर जल्दी से जाग गए , क्यूंकि हमारे पास केवल आज का ही दिन था शिमला घूमने के लिए ,कॉलेज से बंक मार कर जो आये थे |
जल्दी से नित्य क्रिया और नहा  धो कर कपडे पहने और चल दिए बाहर शिमला की हसीन वादियों में रम जाने को.....

बाहर का मौसम हल्का सर्द था ,गुनगुनी धुप हमारे ऊपर पड रही थी , कुल मिला के मौसम बहुत सुवाहना था ...........
होटल से कुछ दूर ही चले थे की सामने सड़क पर एक गोल गप्पे  वाला मिल गया ,,,, अचानक गज्जू के पैर वहां पर रुके ....

हमने बोला भाई क्या हुआ क्यूँ रुक गया ...तो गज्जू बोला यार गोल गप्पे  खाने का बड़ा मन हो रहा है ....हमने  एक दुसरे की तरफ देखा और सोचा इस बन्दे को तो  कभी ऋषिकेश (हमारा निवास ) में गोल गप्पे खाते हुए नहीं देखा , यहाँ अचानक इसके मन में ये लालसा कैसे जागृत हो गयी .....चलो ठीक है शायद यही सोच के बोला होगा की क्या पता फिर कभी शिमला आना होगा या नहीं , अगर आना होगा भी तो दोस्तों के साथ शिमला में गोल गप्पे खाने का मौका फिर कभी शायद ही मिले ........हमने हामी भरी और तैयार हो गए गज्जू के साथ गोल गप्पे खाने के लिए .....बेचारे का मन रखने के लिए......

लगाओ भाई गोलगप्पे एक ही प्लेट से खायेंगे हम सब ...अचानक वीरू पीछे से बोला हँसते हुए ....एक प्लेट में खाने से प्यार बढ़ता है ....प्लेट दी गयी एक एक करके गोल गप्पे आते गए ,,जिसके हाथ में आता गया , उठाते गए ,खाते गए और पता ही नहीं चला कब 50 से ऊपर गोल गप्पों की संख्या पहुँच गयी .......
आखिरकार गोल गप्पे वाले को ही बोलना पड़ा ......भाई साहब 50 हो गए और लगाऊं क्या ....उसकी ये बात सुनकर थोड़ी हंसी भी आयी और डर भी लगा ......................... हंसी इस बात की ,,,,,, कि हम भुक्कों की तरह खाए जा रहे थे ,,और डर इस बात का कि पता नहीं कितने का बिल बन गया होगा गोल गप्पे का ,, क्यूँ की हमारे पास पैसे बहुत कम थे ,,,,और अभी तो कुछ किया भी  नहीं था ....कहीं हमारी शिमला की यात्रा गोल गप्पे में ही न घुस जाए |
खैर गोल गप्पे वाले से निपट कर हम आगे चलने लगे पैदल रोड पर ....किसी से पूछने पर पता चला आगे थोड़ी दूर चलने पर एक सुंदर जगह है शायद उस जगह  का नाम “रिज” था , शायद वहां एक चर्च था और एक बड़ा सा मैदान भी .....

वहाँ पहुंचे तो देखा कि सच में बहुत ही मन मोहक नजारा था चारों तरफ का ,,,,, सैलानीयों का चारों तरफ जमावड़ा था ..... सामने बर्फीले पर्वतों की और से हलकी हलकी सर्द हवा चल रही थी जिस कारण हलकी ठण्ड का भी अनुभव हो रहा था ....
दोनों हाथ की मुठठियों को बगल में दबा कर हम अपने चारों तरफ का नजारा निहार रहे थे ,,,,सच में मन को प्रफ्फुलित करने वाला नजारा था |

कुछ समय तक प्रकृति को निहारने के बाद हम वहां से आगे बढ़ने लगे .....रोड के दोनों और बड़े बड़े लेकिन सुंदर होटलों और भवनों की लम्बी कतारें  ,,बीच बीच में रंग बिरंगे फूलों से लदे हुव पेड़ और पेड़ों से झड़कर सड़क में गिरे हुवे फूल वहां की सुन्दरता में चार चाँद लगा रहे थे ...वाकई में मन को मोह लेने वाला दृश्य था ........
कुछ समय तक चलने के बाद हल्की  भूख का अहसास हुआ ..... प्रकृति में इतना रम गए थे की पता ही नहीं चला कब शाम के चार बज गये .....
सबकी सहमती के बाद हमने चिकन खाने का फैसला किया और चल दिए किसी अच्छे लेकिन सस्ते ढाबे की खोज में .....

जेब टाइट थी हमारी लेकिन खाना भी हमको चिकन था .....थोड़ी सोचने और एडजस्ट करने वाली बात थी .....
चलो कुछ देर भटकने के बाद एक सस्ता ढाबा मिल ही गया .. चिकन का आर्डर दिया गया साथ में तंदूरी रोटी का भी .....वेसे हमने आर्डर देने से पहले आने वाले खर्च का हिसाब लगा लिया था ....बजट में था ..इसीलिए संतुष्टि थी......कुछ ही देर में चिकन आ गया गया टेबल के ऊपर.....आने की देर थी सब टूट पड़े उस बेचारे चिकन के ऊपर ,जो शायद कुछ देर पहले अपने दोनों पैरों पे खड़ा था जिन्दा ........लेकिन अब हमारी थाली में ....टाइम टाइम की बात हैं .....मैं खाने से पहले यही बात सोच रहा था की अगले जन्म में हम भी मुर्गा बनेंगे और ये भी हमे ऐसे ही खायेंगे ..... उफ्फ्फ्फ़ ....फिर सोचा की भावनाओ में बह से कोई फायदा नहीं ,, फिलहाल  चिकन पे ध्यान दो और अपनी भूख मिटाओ , अगला पिछला जनम जब होगा तब होगा देख लेंगे....

कुछ ही देर बाद हमारी थाली में सिर्फ बचे खुचे ही अवशेष पड़े थे जो किसी तरह से दांतों से न चबाये गए हों .....किंशुक और वीरू  की  डकार   से साबित हो गया था की सबका पेट अच्छी तरह से फुल हो गया है.....
पैसे चुकाने के बाद हम वहां से आगे चल दिए एक नयी ऊर्जा के साथ ....कुछ देर चलने के बाद वहाँ एक सरकारी अस्पताल दिखा नाम था “इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज” .......चूँकि हम मेडिकल के ही स्टूडेंट थे तो वहां जाने की इच्छा जाहिर हुई और आपस में विचार विमर्श करने के बाद हम अस्पताल में घुमने चले गए....
इस अस्पताल का एक और मजेदार किस्सा एक ये भी है की  ..किंशुक अपने घर में ये बहाना बना कर शिमला आया था,, की हम सब कॉलेज के स्टूडेंट कॉलेज की तरफ से मुंबई के  किसी  बहुत बड़े मेडिकल संस्थान में जा रे हैं पढ़ाई के सिलसिले में .....लेकिन आना था हमको शिमला .......तो सवाल ये था की कैसे कोई सुबूत ऐसा मिले जिस से साबित हो की किंशुक शिमला नहीं बल्कि मुंबई गया हो ......
काफी सोचने के बाद हमने किया ये की ....किंशुक को शिमला के अस्पताल के  सामने खड़ा कर के उसकी एक फोटो खिंच ली .....और उसके बाद उस फोटो में स्टूडियो वाले से बोलकर अस्पताल के बहार लगे बोर्ड में से शिमला मिटा कर मुंबई लिखवा दिया .....

अब ये देखने में एसा लग रहा था   “इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज मुंबई” ......बात बन गयी ......शायद इसको दिखा कर किंशुक बच जाये घर में .....लेकिन डर इस बात का था की कहीं इस अस्पताल का पता किंशुक के पिताजी को पहले से न हो....नहीं तो खेल उल्टा पड जायेगा .....लेकिन एसा कुछ नहीं हुआ ...सब कुछ ठीक रहा ...........

हाँ तो थोडा पीछे चलते हैं .... कुछ देर तक अस्पताल में घुमने के बाद वापिस होटल में जाने लगे तो रोड के किनारे एक सेब वाला बैठा था .....गज्जू बोला की शिमला के सेब बहुत फेमस हैं और यहाँ सस्ते भी मिलते हैं .... चलो लेलो फिर पांच  किलो ....वीरू ने अनुमति दी .....
सेब के दाम पूछे तो हम हैरान हो गए और गुस्से से गज्जू की और देखने लगे सब एक साथ ..इसी ने बोला था की यहाँ सेब सस्ते मिलते हैं ....    ये 2007 की बात है .. 200 रुपये किलो सेब थे तब वो ..... जबकि वहां सेब की अच्छी पैदावार होती है ....तब भी इतने महंगे ....
खैर कहाँ पांच  किलो लेने की सोच रहे थे आधा किलो में सिमट गए रेट सुन के ..............सेब लेने के बाद आगे चलते हुए किंशुक और वीरू आपस में कुछ - खुसर फुसर करने लगे थे ....मै  ठीक से नहीं सुन पा रहा था की किस बारे में ..... दोनों की नजरें  जैसे   चारों और कुछ खोज रही थी लेकिन पता नहीं क्या????  फिर थोड़ी देर आगे चलने के बाद अचानक वीरू के कदम रुके और एक मुस्कान उसके चेहरे पर आने लगी फिर वो मुस्कान वीरू से होकर किंशुक के चेहरे पर आकर ठहर गयी ....दोनों बहुत खुश ...जेसे कोई खजाना मिल गया हो ......




वीरू और किंशुक दोनों तेजी से रोड के एक किनारे  चले गए मुझे ओर गज्जू को एक तरफ छोड़कर  एक दुकान पे ......अरे यार ....... ये एक मदिरा की दुकान थी ......तब समझा की ये ख़ुशी की गंगा जो बह रही थी इन दोनों के चेहरे पर इसकी गंगोत्री यही दुकान है |

दोनों ने एनर्जी ड्रिंक लिए वहां से और बाहर निकलने लगे ..बाहर निकलते हुए वीरू के चेहरे में एक बहुत बड़ी मुस्कान थी ..ऐसा लग रहा था जैसे की कोहिनूर हीरा मिल गया हो ....
उसके बाद हम सीधे होटल में गए और थोड़ी देर लेट गए और गप्पे. मारने लगे दिन भर की और आगे का प्लान बनाने लग गए ...

इधर रात  की शुरुवात होने को थी और उधर वीरू और किंशुक के कांच के गिलास बजने लगे और काफी देर तक बजते रहे ....उस रात  को किंशुक की तरफ से किसि बात की पार्टी थी जिस वजह से खाने पीने का प्रोग्राम बहुत अच्छा हो गया और उसको छोड़ के बाकी सब की जेब के  पैसे भी बच गए | खाने के बाद देर रात तक गप्पे मारते हुहे न जाने कब आँखों में नींद का पहरा लग गया और निचंत हो कर सो गए |

भाई साहब दरवाजा खोलिए .....(किसी ने दरवाजा खटखटाया) .....भाई साहब ......चाय लाया हूँ..........
 कोन है यार इतने सुबह सुबह ......गज्जू ने आँखे मलते हुवे बिस्तर से खड़े होते हुवे  नींद के झोंके  में बोला ...और उठ कर दरवाजा खोल दिया ....तो सामने हाथ में चाय  के कप लेकर होटल का एक कर्मी खड़ा था .....उसने अंदर आके टेबल में चाय के कप रख दिए और जैसे ही बाहर जाने लगा तभी .....पीछे से किंशुक की आवाज आई ..........भाई जी जरा रुकना .............किंशुक उठ कर बिस्तर पर बैठ गया...
फिर वो होटल कर्मी वापिस आया और किशुक से बातें करने लगा .....शायद किंशुक उसे वहां की प्रसिद्ध टॉय ट्रेन (छोटी रेल गाडी जो वहां पहाड़ो में चलती है ) के बारे में पूछ रहा था... तो उस कर्मी ने किंशुक को पूरी जरुरी  जानकारी दे दी ................

आज हमे वापस अपने घर ऋषिकेश जाना था ...क्यूँ की  और मस्ती करने के लिए हमारे पास पैसे नहीं थे  ....तो हमने अपने बैग पैक किये , नाश्ता किया और होटल का बिल जमा कर के वहां से बहार सड़क पर निकल गए ....और रेलवे स्टेशन की तरफ चलने लगे ...
वहां पहुँचने के बाद हमने शिमला से कालका तक जो टॉय ट्रेन जाती है ,का किराया पूछा तो कान खड़े हो गए .........लगभग किराया था 700 के करीब ......हमारे पास उतने पैसे नहीं थे की हम टॉय ट्रेन के मजे लेते ......टिकेट खिड़की से जेसे हि मुह लटका के  किंशुक वापिस आ रहा था ...तभी पीछे से टिकेट वाले ने बोला .....भाई जी जिसका मैंने आपको रेट बताया वो महाराजा एक्सप्रेस है .....(एसा ही कुछ शाही नाम था उसका) ...... एक और साधारण ट्रेन है ..उसका टिकेट 80 रूपए है....

यह सुन कर हमारे चेहरे फिर से खिल गए और पहाड़ी ट्रेन की सवारी करने के लिए उतावले होने लगे ....क्यों, 80 रुपये का बजट तो था हमारा....टिकेट लिए और चढ़ गए ट्रेन में ....ट्रेन अंदर से सुंदर , साफ़ सुथरी और कम भीड़ वाली थी......हम अपनी अपनी सीट पर बैठ गए और ट्रेन के चलने का इन्तजार करने लगे |
इन्तजार कुछ जादा ही लम्बा हो गया था ....और न जाने कब मेरी आँख लग गयी और क्षणिक स्वप्न देखने लगा........ तभी कुछ ही देर में एक तेज हॉर्न के बजने से मेरी नींद एकदम से खुली ...देखा की ट्रेन धीरे धीरे चलने लगी थी ...छुक छुक छुक छुक ...


जेसे जेसे ट्रेन रफ़्तार पकडती गयी उतनी ही तेजी से बहार के पेड़ पौधे और झाड़ियाँ पीछे की तरफ भागने लगे ....बहार का नजारा देखने लायक था....सामने दूर पर्वतों के बीच से सूरज उग रहा था एक लालिमा के साथ ....चारों और पक्षियों के चहचहाने का शोर ...
एक सर्द हवा जो तन से टकरा रही थी ..एसा महसूस हो रहा था जैसे जन्नत की सैर कर रहे हों .. ट्रेन  जंगल , पहाड़ और सुरंगों के बीच से होते हुवे टेड़े मेढे रास्तों में इठलाते हुए आगे बढ़ रही थी .....
जंगलो, सुरंगों  , गावों , नदियों के बीच से होते हुए ट्रेन जब कालका के नजदीक पहुंची तो मन उदास हो गया .....फिर से वही शोर गुल .. गाड़ियों के हॉर्न , लोगो का हल्ला .कारखानों की आवाजें....फिर से वही पुराना हिसाब किताब ..फिर वही पुरानी भीड़ भाड वाली  जिंदगी .....
यही सोचते सोचते कालका स्टेशन मर ट्रेन रुक गयी ....हमने अपना अपना बैग उठाया और चल दिए आगे के घर वापसी के  सफ़र में..
 ..जितना रोमांचित आने के समय थे उतने हि उदास जाते समय .....आते हुवे जितने चेहरे खिले हुवे  थे  जाते हुए मुरझाये हुए थे...  खैर ये  तो जीवन का खेल है......

रात भर कई ट्रेन , बसें पकड़ी , छोड़ी ...रात भर का यही ड्रामा रहा ...और आखिरकर  सुबह के तीन -चार  बजे  तक धक्के खाते खाते पहुँच ही  गए ऋषिकेश ........उस समय कॉलेज के हॉस्टल का गेट भी बंद था ....इसीलिए दीवार फांदकर अंदर दाखिल हुए चुपके से और अपने अपने रूम में चले गए .....
मै भी उस दिन वहीँ रुक गया था हॉस्टल में ही , क्युकी घर जाने के लिए उस समय कोई सवारी नहीं मिलती ...तो सोचा यही रुक जाता हूँ ...और सुबह होते ही वापिस चला जाऊंगा  घर |
फिर अगले दिन से वही ढर्रा ..कॉलेज आओ , क्लास अटेंड करो ,,प्रैक्टिकल  वगेरा वगेरा ........

आज भी उस शिमला के सफ़र को याद करता हूँ तो मन रोमांचित हो जाता है....उस समय हमे कोई भी चिंता फ़िक्र नहीं थी ,,यारों की यारियां , मस्तियाँ  , शैतानियाँ ..बस यही होती थी....
लेकिन अब सब कुछ बदल चुका है....अब परेशानियां , मजबूरियां , जिम्मेदारियां ...... इन सब से निकल ही नहीं पाते .....

पहले तो रोज रात दिन साथ रहते थे सभी दोस्त ....और अब तो कई महीनो पहले से ही मिलने का प्लान बनाना पड़ता है....और तब भी जरुरी नहीं की मिलना होगा ही........तब तक कुछ न कुछ एसा हो जाता है ,की सारा का सारा प्लान धरा का धरा रह जाता है ....या तो परिवार की जिम्मेदारी की वजह से या फिर नौकरी या अन्य आमदनी की वजह से ......


सुख में दुःख में मिल जुल के जो वक्त हमने दोस्तों के साथ काट दिए हैं ...वही थे दिन सच में ...अब तो बस उन दिनों  की याद मात्र ही शेष है|

Deepak nautiyal©®


Comments

Unknown said…
Great move rencho keep it up