आम का पेड़



जब से प्रदीप ने होश संभाला था  तभी से दिव्या  उसके मन को भाने लगी थी ...दिव्या एक सुंदर सूरत के साथ साथ सुंदर सीरत की भी  धनी थी , रंग दूध की तरह सफ़ेद , बाल काले और लम्बे , मुलायम ..आँखों में एक अजीब मनमोहक सी चमक.......
उम्र तो छोटी थी उस समय उन दोनों की लेकिन प्रदीप की  आँखों में दिव्या के लिए हमेसा से ही एक बेकरारी सी रहती थी ...
हमेसा ही वह उसके बारे में ही सोचता रहता था ...और किसी न किसी बहाने से उसके पास जाने की या उसे देखने की कोशिश करता रहता...... लेकिन दिव्या इस बात से बिलकुल अनजान थी ...उसे बिलकुल भी नहीं पता था की प्रदीप उसके लिए एक भंवरे की तरह किस कदर मंडराता रहता है  .....
लेकिन एक अच्छी  बात प्रदीप के अंदर भी थी ...वो ये की उसने कभी भी दिव्या को यह जाहिर ही नहीं होने दिया की उसके मन में उसके  लिए क्या है ....यहाँ तक की उसने दिव्या की और सामने से आँख उठा कर कभी प्रत्यक्ष रूप से बात तक भी नहीं करी थी ....और न ही कभी दिव्या के  सामने उसका नाम लिया था |
प्रदीप बचपन में  ही स्कूल पढने के लिए  अपने परिवार के साथ शहर चला गया था....ओर दिव्या वहीँ गावं के स्कूल में ही पढ़ती थी ,क्युकी उसका परिवार वहीँ गावं में ही रहता था ....
जब भी स्कूल की कोई भी छुट्टी पड़ती थी तो प्रदीप जल्दी से बिना समय गवांये  अपने गावं चला आता था .....आखिर दिव्या की याद जो उसे खींच लाती  थी ... शहर में रहते हुए कई दिनों तक उसे दिव्या की याद बहुत सताती थी ....पढ़ाई में ध्यान कम और दिव्या पे जादा रहता था ...और रोज यही दुवा करता की काश मै भी गावं के स्कूल में होता तो दिव्या के साथ ही स्कूल जाता साथ पढता और साथ खेलता ....और वह हर रोज स्कूल की कोई न कोई  छुट्टी पड़ने का इन्तजार करता रहता .....
वो पूरे दो महीनो की गर्मियों की छुट्टियां पड़ना और प्रदीप का परीक्षा ख़त्म होते ही तुरंत गावं पहुँच जाना उसके के लिए एक बहुत जरूरी नियम की तरह हो गया था ......अपने  घर में बाद में जाता और दिव्या के घर की तरफ पहले जाता ......
चूँकि प्रदीप के घर में जाने के दो रास्ते थे ...एक छोटा  और एक लम्बा ....जो रास्ता लम्बा और घुमावदार था उस रास्ते में बीच में दिव्या का घर पड़ता था ...इसीलिए वो हमेसा घर जाने के लिए उसी रास्ते का चुनाव करता था ये सोच के की क्या पता घर के बहार दिव्या दिख जाये तो छुट्टियों की शुरुवात ही अच्छी हो जाए | लेकिन हमेसा उसकी किस्मत साथ नहीं देती थी ...क्यूँ की कई बार दिव्या भी छुट्टियों में अपने किसी न किसी  रिश्तेदार के घर चली जाती थी ....और जब यह प्रदीप को पता लगता तो वो बहुत मायूस हो जाता था ....आखिर हो भी क्यूँ न ...जिस पल  का इन्तजार वो पिछले कई महीनो से कर रहा था और वही उसे न मिले तो किसी का भी दिल टूट सकता था |
लेकिन इस बार प्रदीप की किस्मत अच्छी थी और उसे  मायूस नहीं होना पडा , क्यूँ इस बार छुट्टियों में दिव्या गावं में ही थी......
 वह अपने किसी रिश्तेदार के घर नहीं गयी थी ,,क्यूँ की शायद इस बार उसकी तबियात थोड़ी नासार थी ....
यह  वाक्या है मई – जून के  आस पास का ...... गर्मि अपने चरम पे थी , लेकिन गावं के हरे भरे वातावरण , चारों तरफ हरे भरे पेड़ पौधे जिनसे गुजरकर गर्म हवा के थपेड़े भी शीतल होकर अपनी मौजूदगी बयाँ कर रहे थे ....कुल  मिला के मौसम बहुत सुवाहना था .....सुबह से ही गावं का माहोल बहुत ही सुखमय हो जाता था ...सुबह सुबह चिड़ियों के चहकने की ध्वनि...गायों का रंभाना ,,हलकी हलकी  मधुर पवन के चलने की आवाज सच में मंत्रमुग्ध कर देता था | उसी समय गावं की महिलायें बर्तन ले के गौशाले की तरफ जाने लगते दूध दुहने के लिए ...पुरुष बैलों को लेकर खेतों में जाने लगते .... ये सब देख के मन को एक सुखमय एहसास होता था |
जेसे ही प्रदीप दिव्या के  घर की आगे से गुजरने लगा तो उसकी निगाहें उसी तरफ थी और बैचेन हो के उसे ही खोज रही थी ,,,,    एक बार दिख जा ..बस एक बार दिख जा ...प्रदीप मन में बार बार यही सोचता हुआ आगे बढ़ रहा था ...उसके कदमो की गति सामान्य से थोड़ी कम हो गयी थी ...क्यूँ की वह वहां से गुजरने में ज्यादा समय लगाना चाहता था , इसी उम्मीद में की क्या पता दिव्या दिख जाये एक बार .....लेकिनं एसा हो न सका..वह उसे नहीं दिखी ...शायद दिव्या उस समय गाय भैंसों के लिए घास लेने खेतों में गयी थी .....
मायूस चेहरे के साथ प्रदीप ने कदमो की गति बढाई और अपने घर की तरफ रवाना हो गया क्यूँ की थोड़ी ही देर में अँधेरा होने वाला था .....
प्रदीप का अपना परिवार तो शहर में ही रहता था , जब भी छुट्टियों में गावं आता तो वो अपने चाचा और ताऊ के घर में ही रहता था ....यहाँ उसके चचेरे भाई बहन चाचा चाची  , ताऊ ताई सब रहते थे .... घर के बिलकुल पास उनकी गौशाला थी जिसमे गाय ,भैंस , बकरियां आदि पाली हुई थी .....जिनको घास चराने के लिए रोज गावं के पास ही के जंगल में किसी न किसी को ले जाना पड़ता था , क्यूँ की वहां तेंदुए की डर हमेसा ही लगी रहती थी , क्यूँ की अकेला पा कर तेंदुवा या अन्य जंगली जानवर किसी न किसी के मवेशी को अपना शिकार बना लेता था , जो की गावं वालो के लिए एक बहुत बड़ी क्षति होती थी ....इसीलिए साथ में किसी न किसी को जाना जरुरी होता था निगरानी के लिए | 
शाम को घर पहुँचने के बाद प्रदीप अपने रिश्तेदारों और भाई बहनों से मिला और सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद थोडा आराम करने के लिए चारपाई पर लेट गया और दिव्या के बारे में सोचने लगा और आने वाले कल का प्लान बनाने लगा ....सोचते सोचते प्रदीप की आँख लग गयी ..आखिर वो सफ़र करके थोडा थक भी गया था .....
प्रदीप भाई ...ओ प्रदीप भाई उठो ..खाना खा लो ...खा के फिर से सो जाना ...... प्रदीप का  चचेरे भाई रमेश प्रदीप को खाना खाने के लिए जगाने की कोशिश कर रहा था .....प्रदीप उठा और वहीँ चारपाई पर बैठ कर खाना खाने लगा ...खाते खाते भी प्रदीप को नींद के झोंके आ रहे थे ..शायद दिव्या के घर की तरफ से जाने के लिए उसने लम्बा रास्ता जो चुना था अपने घर जाने के लिए इसीलिए वो कुछ ज्यादा हि थक गया था.... कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है  ...लेकिन प्रदीप ने तो आज केवल खोया ही खोया था ...क्युकी जिसके लिए इतना लम्बा रास्ता चला था वही उसे नसीब न हुआ ...कुछ निराशा तो इस बात की भी थी|
खैर अभी तो पुरे दो  महीने थे हाथ में ....आज नहीं तो कल दिव्या के दर्शन हो ही जायेंगे ...यही सोचते हुए प्रदीप फिर से खाना खा के वहीँ चारपाई पर ही सो गया ......
सुबह जब मवेशियों में गले में बंधी घंटियों की आवाज से प्रदीप की नींद खुली तो सुबह के आठ बज चुके  थे ....उसके चचेरे भाई मवेशियों को लेके चुगाने के लिए जंगल की और जाने लगे थे ..प्रदीप एक झटके से चारपाई से उठा और अपने भाई रमेश से उसे भी अपने साथ ले जाने की विनती करने लगा ....क्यूँ की प्रदीप को पता था की दिव्या भी अपने मवेशियों को चुगाने के लिए जंगल जाया करती है  ....और वो इसी बहाने दिव्या से मिलना चाहता था ....
रमेश प्रदीप की बात मान गया और इन्तजार करने लगा प्रदीप का .....
प्रदीप ने जल्दी से अपने काम निपटाए और नाश्ते के नाम पर एक रोटी के अंदर चीनी भर के उसका रोल बनाया और चल पड़ा रास्ते  खाते खाते ..क्यूँ की वो दिव्या को देखने के लिए इतना उतावला जो था ...
आखिर जब वह रमेश के साथ मवेशियों को ले कर नियत स्थान पर पहुँच गए तो रमेश वहां एक बड़े से पथ्थर पर बैठ गया निगरानी करने ....और प्रदीप की आँखे वहां जंगल की और आने वाले रास्ते पर ही टिकी थी ....वह रमेश की बातों में कुछ खास ध्यान नहीं दे रहा था ...क्यूंकि उसे तो सिर्फ  दिव्या की ही  तलाश थी बस ....
कुछ देर इन्तजार करने के बाद जब दिव्या अपने मवेशियों के साथ जंगल नहीं आई तो प्रदीप थोडा उदास सा हो गया और वहीँ निचे पथ्थर के ऊपर बैठ गया .........वह चाह कर भी अपने भाई रमेश से दिव्या के बारे में नहीं पूछ सकता था , क्यूँ की फिर न जाने कितने सवाल जवाब होते रमेश और प्रदीप के बीच में  .... इन्तजार करने के अलावा प्रदीप के पास कोई और चारा भी नहीं था .....    .......आएगी की नहीं .....................................इसी सोच विचार में अचानक जंगल के  मंद मधुर ध्वनि  के बीच में घंटियों की प्रबल ध्वनि वहां के वातावरण में गूंजी ...यह सुनकर प्रदीप के कान खड़े हो गए और वो झट से उठ कर खड़ा हो गया और रास्ते की तरफ देखने लगा ...
तभी सामने रास्ते के मोड़ के पीछे  से एक गाय सर हिलाते हुए उसकी तरफ आते हुए प्रदीप को दिखी  ,प्रदीप थोडी और  कोशिश करने लगा मोड़ के उस तरफ देखने की ,,, फिर एक एक करके सभी मवेशी आगे आते गए..प्रदीप उस समय अपनी पलकें भी नहीं झपका रहा था और एकटक हो कर मोड़ की तरफ ही देखे जा रहा था .....
सभी मवेशियों के निकलने के बाद प्रदीप को वो दिखा जिसका इंतज़ार उसे न जाने कितने महीनो से था ...जिसका चेहरा हमेसा ही उसकी आँखों में रहता था और हर पल जिसके बारे में  सोचता रहता था.......जी हाँ वो दिव्या ही थी .........
बदन पर हरे रंग का सूट सलवार , उस पर गहरे लाल रंग का दुपट्टा लिए मानो ऐसे लग रही थे जेसे की किसी हरे घने वृक्ष पर लाल फूलों की चादर ओढी हुई हो ...आँखों में एक चमक ...चेहरे में एक हलकी से मुस्कान ......हाथ में पशुवों को हांकने के लिए एक लकड़ी की छड़ी और गोद में एक छोटा सा सफ़ेद रंग का मेमना जिसे वह प्यार से सहलाते हुए धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी ......वह किसी पहाड़ की परी से कम नहीं नहीं लग रही थी ........प्रदीप तो उसे देख के जेसे स्लो मोशन वाली इफ़ेक्ट  में चला गया था .........
वह चलते चलते प्रदीप के करीब आई और कहा ..........अरे प्रदीप तुम कब आये गावं ????? यह सुनकर  अचानक प्रदीप झेंप गया और उसकी चेहरे से नजर निचे करते हुए धीरे से बोला ....अअअअअ........कल शाम को ......,,प्रदीप के अंदर इतनी हिम्मत नहीं थी की वह दिव्या के चेहरे की तरफ देख के जवाब देता .....
बस इतनी सी ही बात हुई थी उस वक्त .....फिर वहां और भी लोग अपने अपने पशुवों को लेकर आने लगे और सब एक जगह इकठ्ठे होकर गप्पें मरने लगे ...मवेशी सब आस पास ही  घास चर रहे थे ...........प्रदीप अकेला ही अभी भी उसी पथ्थर पर बैठा हुआ था और बीच बीच में सबसे नजरें बचा कर दिव्या की तरफ चुपके से देखता रहता ......उसको देखने भर से ही प्रदीप बहुत खुश हो जाता था ........जेसे ही दिव्या की नजर  अचानक से प्रदीप पर पड़ती तो प्रदीप तुरंत घबराकर  कर अपनी नजर दूसरी तरफ हटा लेता .....
कुछ देर तक यही आंखमिचोली का  सिलसिला चलता रहा .........अब पशुवों की टोली धीरे धीरे घास चरते चरते हुए उस जगह से  बहुत आगे  निकल चुकी थी , इसलिए अब सबको भी उसी अनुसार अपनी जगह बदलनी थी.............तो सब लोग भी वहां से उठ कर दूसरी जगह चलने लगे ......प्रदीप भी थोड़ी देर बाद   उठ कर उनके पीछे चलने लगा और उन सबसे कुछ दुरी बनाते हुए वहीँ एक छोटे से सूखे हुए पेड़ की खूंट के ऊपरबैठ गया ...............
जहाँ पर बाकि सब चरवाहे बैठे थे वहीँ पर नजदीक एक बहुत बड़ा आम का पेड़ था , जो कि काफी पुराना और अनेक  विशालकाय भुजाओं वाला था उस पर कई  पक्षियों का आसियाना भी था .... उसकी टहनियों पर आम लदे हुवे थे ...जितना पड़ा पेड़  उतने  ही छोटे उस पर लगे हुवे आम थे ....कुछ कच्चे कुछ अध् पके ओर कुछ पके हुए.....
कुछ देर बाद प्रदीप का  चचेरा भाई रमेश उठ कर खड़ा हुआ और पथ्थर फेंक कर आम तोड़ने की कोशिश करने लगा ...जो आम निचे गिरते थे बाकी लोगों के साथ दिव्या भी उनको उठाने के लिए झट से जाती और ....छीनाझपटी में कभी आम हाथ लगता था और कभी नहीं .... चूँकि पेड़ बहुत बड़ा था तो उस पर कोई आसानी से नहीं चढ़ पाता था ......
प्रदीप बहुत देर से ही दिव्या की सभी गतिविधियों को ध्यान से देखता जा  रहा था ..उसका नीचे गिरे  हुए आम पर झपटना और तुरंत खाना शुरू कर देना........  यह सब देखते हुए प्रदीप के मन में एक अजीब सा ख्याल आया खुद को दिव्या की नजरों में हीरो बनाने का ....उसने सोचा की क्यों न इस पेड़ पर ही चढ़ा जाए और ऊपर से ही खूब सारे आम तोड़ कर दिव्या को दे दिए जायें .....जिस से वह खुश हो जाये .....
प्रदीप ने मन ही मन में इरादा कर लिया की वह दिव्या के लिए जरूर इस पेड़ पर चढ़ेगा ......और रमेश से बोला की वह इस पेड़ पर चढ़ेगा और सबके लिए आम तोड़ेगा ...रमेश ने झट से यह कहते हुवे मना  कर दिया की पेड़ बहुत बड़ा और  खतरनाक है इसमें चढ़ना ठीक नहीं है....,,,,,,,,मेरे  पेड़ में चढ़ने वाली बात जब दिव्या ने सुनी तो मुझे लगा की वो भी मुझे पेड़ में चढ़ने से मना करेगी जरूर..........लेकिन एसा कुछ नहीं हुवा ......उसने मेरे पेड़ पर चढ़ने वाली पर तुरंत हामी भर दी  ...शायद उसको अभी और आम खाने थे ........
रमेश प्रदीप को पेड़ पर चढ़ने से मना करता  रहा लेकिन उसने रमेश की एक न सुनी और वह पेड़ पर चढने की कोशिश करने लगा ....बहुत कोशिश करने के बाद भी वह पेड़ पर नहीं चढ़ पा रहा था ....उसको अंदर ही अंदर से बहुत शर्मिंदगी का एहसास हो रहा था....और सोच रहा था की हीरो बनने के चक्कर में हाँ तो बोल दिया पर यहाँ तो खेल उल्टा ही पड़ता नजर आ रहा था ......
तभी रमेश ने प्रदीप के पैर को सहारा दिया जिस से वह थोड़ी और कोशिश करने के बाद पेड़ के पहले पडाव पर पहुँच गया था ......यहाँ से वह टहनियां पकड कर ऊपर चढने लगा ...  चूँकि नीचे के हिस्सों में  आम खत्म हो चुके थे इसलिए प्रदीप को आम तक पहुँचने के लिए काफी ऊपर तक चढ़ना था ...इस से पहले प्रदीप पेड़ पर शायद ही कभी चढ़ा था और यदि चढ़ा भी तो इतने बड़े पेड़ पर तो हरगिज नहीं .....
डरता सहमता टहनियों को पकड़ता हुआ प्रदीप ऊपर की और बढ़ने लगा ...दिव्या की चाहत उसे जो ऊपर धकेल रही थी ..उसे तो किसी भी कीमत पर दिव्या के लिए आम तोड़ने थे ....आखिर थोड़ी देर बाद प्रदीप आमों झुण्ड तक पहुंचा और टहनी को पैर से हिलाने लगा ..जिस से सभी पके हुए आम निचे  टपकने लगे .....प्रदीप तो डर के मारे नीचे भी नहीं देख रहा था....लेकिन उसने हिम्मत करके निचे  देखा तो उसे यह देख कर बहुत सुकून मिला की जिस कार्य के लिए वो यहाँ तक पहुंचा इतनी मुसीबत मोल ली आख़िरकार वह सफल हो रही थी ...नीचे सभी लोग और उनके बीच में दिव्या बड़े मजे से आम चूस रहे थे .....कुछ समय तक तो सब ये भी भूल गए थे की मै पेड़ पर चढ़ा हूँ ...केवल रमेश ही का ही ध्यान बीच बीच में आम के अलावा मेरी और भी था......
अचानक घर से रमेश के लिए उसका छोटा भाई रवि एक अर्जेंट बुलावा लाया  जिसके कारण रमेश को पशुवों को रवि के जिम्मे छोड़कर घर जाना पड़ा......
ये सबके चलते हुए अब दिन ढलने की कगार पर आ गया था ..सूरज ढलने की तयारी में था .......सभी मवेशी अब वापस घर की तरफ जाने लगे थे  और उनके साथ दिव्या और बाकि सभी चरवाहे भी धीरे धीरे घर की तरफ चलने लगे थे .....लेकिन  किसी का भी ध्यान प्रदीप की  तरफ नहीं गया , यहाँ तक की दिव्या को भी उसका ध्यान नहीं आया , जिसके कहने पर  ही वह पेड़ पर चढ़ा था .....
खैर प्रदीप दिव्या को ज्यादा दोष न देते हुवे धीरे धीरे निचे उतरने लगा .....आखिर दोष देता भी कैसे ,,दिव्या को पता ही कहाँ था की प्रदीप के दिल में उसके लिए क्या है.......... उधर सूरज धीरे धीरे ढल रहा  था और इधर प्रदीप पेड़ से नेचे उतरने की लगातार कोशिश कर रहा  था ....
जितनी कठिनाई पेड़ में चढ़ने में हुई थी , उस से कई ज्यादा कठिनाई नीचे उतरने में हो रही थी ....वैसे  भी वह दिव्या के चक्कर में बहुत ऊपर तक जो चढ़ गया था .....टहनियों को पकड़ पकड़ कर प्रदीप नीचे उतर रहा था ....निचे उतरते हुवे कभी उसका पैर टहनी से फिसलता तो कभी संभलता .....उसे निचे उतरते हुए बहुत डर भी लग रहा था ....आखिर डर लगे भी क्यूँ न ......आज से पहले प्रदीप इतने बड़े पेड़ पे शायद ही कभी चढ़ा था ....सब लोग घर की तरफ काफी दूर तक निकल चुके थे ...शायद वो यही सोच रहे होंगे की प्रदीप पेड़ से उतर कर पीछे आता ही होगा ....   लेकिन यहाँ तो प्रदीप की सांस अटकी हुई थी....वह जैसे जैसे  पैरों को नीचे रख रहा था उसकी डर के मारे धड़कने भी तेज हो रही थी ....कभी कभी तो पैर को टिकाने को कोई जगह भी नहीं मिल रही थी .....तो वह पेड़ को दोनों हाथो से टाइट पकड़ कर धीरे  धीरे  निचे फिसलता जब तक की उसके  पैर किसी जगह में नहीं टिक जाते ....
इसी तरह जद्दोजहद कर आखिर वह  पेड़ की मुख्य डाल  तक पहुँच गया जो की बहुत मोटी थी ...अभी भी  यहाँ से जमीन की दूरी बहुत ज्यादा थी ...और अब पकड़ कर उतरने के लिए  भी  कुछ नहीं था ...
सूरज पूरी तरह ढल चुका था .....अँधेरा भी होने लगा था ...और प्रदीप अभी भी वहीँ पेड़ से निचे उतरने की नाकाम कोशिश में था ...कभी वह पैर निचे लटकाता तो कभी वापिस खींचता ..क्यों की अब यहाँ से पेड़ बिलकुल सीधा और बहुत मोटा था ..इसिलए उसे पैर रखने की कोई जगह नहीं मिल रही थी ....कभी वह वहाँ से नीचे छलांग लगाने की सोचता तो कभी पेड़ को दोनों हाथों से पकड़ कर निचे फिसलने की ....लेकिन उसे किसी भी तरह से कामयाबी नहीं मिल रही थी ....और वह हताश और निराश हो कर वहीँ बैठ गया ....
थोड़ी देर बाद उसने हिम्मत कर के फिर से एक बार और कोशिश करने का मन बनाया और पेड को दोनों हाथों से पकड़ कर अपने एक पैर को नीचे लटकाने लगा और पैर को टिकाने को कोई जगह खोजने लगा ..इस दौरान वह नीचे  नहीं देख पा रहा था  ...अचानक तभी  उसके पैर को किसी एक कोमल सी चीज का स्पर्श हुआ .....वह निचे नहीं देख पा रहा था तो पैरों से ही छू कर उस चीज को पहचानने की कोशिश करने लगा वह कोमल सी चीज उसके पैर के लिए सहारे का काम कर रही थी लेकिन प्रदीप बिना कुछ जाने हुए उस पर भरोसा नहीं कर पा रहा था .....तभी निचे से आवाज आई .......अरे प्रदीप ये  मेरा हाथ है .....तुम इसमें पैर रख कर नीचे उतर जाओ....प्रदीप थोडा आश्चर्यचकित हुआ ये आवाज सुनकर ....क्यूँ की ये आवाज दिव्या की थी..........
प्रदीप अंदर ही अंदर से ख़ुशी से फुला नहीं समां रहा था .......उसे तो जमीन में ही रहकर जन्नत  का एहसास होने लगा था  ....
दिव्या के फिर से कहने पर वह उसके हाथों के सहारे पेड़ से नीचे उतरने लगा ...वह जानबूझ कर दिव्या के हाथों में ज्यादा जोर नहीं डाल रहा था जिस से की उसे कहीं ज्यादा तकलीफ न हो .....और थोड़ी देर में वह पेड़ से नीचे उतर गया ...
और दोनों घर की तरफ जाने लगे .....प्रदीप सर निचे झुकाए चल रहा था ...तभी दिव्या ने उसे बोला ....जब तुम्हे पेड़ में ठीक से चढना नहीं आता था तो क्यों चढ़े फिर ...मना  नहीं कर सकते थे  क्या ....
प्रदीप ने धीरे से सर हिलाते हुए हामी भरी , लेकिन कहा कुछ नहीं ...थोड़ी देर में उसने हिम्मत करते हुए बोला की ....मै तुम्हारे लिए आम तोड़ने के लिए पेड़ में चढ़ा  क्यूँ की तुम्हे आम बहुत पसंद हैं .......
दिव्या ने थोडा बनावटी गुस्से में प्रदीप को कहा ......अरे ये क्या बात हुई .....आम पसंद हैं तो क्या हुआ ....इसके लिए तुम अपनी जान जोखिम में में थोडा ना डालोगे ......नहीं खाती आम तो मर थोडा ही जाती मै ............
दिव्या का अपने प्रति इतना लगाव देख कर प्रदीप मन ही मन में बहुत खुश हो रहा था ...सोच रहा था की आम के बहाने थोड़ी देर दिव्या के साथ रास्ता चलने का और थोड़ी बात करने का सौभाग्य तो मिला.......थोड़ी देर में हम गावं पहुँच गए अब यहाँ से एक रास्ता प्रदीप के  घर की तरफ और दूसरा दिव्या के  घर कि तरफ जाता था.....
वहां पर थोडा देर रुकने और बातें करने के बाद दिव्या अपने रास्ते चली गयी लेकिन प्रदीप वहीँ पे खड़ा रहा और दिव्या को देखता रहा जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हो गयी ...शायद प्रदीप को उसके एक बार पलटने का इन्तजार था ....लेकिन एसा कुछ न हुआ और प्रदीप भी अपने रास्ते चल पड़ा उसके चेहरे पर ख़ुशी और मायूशी दोनों झलक रही थी  ख़ुशी इस बात की ,, कि कुछ समय उसे दिव्या के साथ रास्ता चलने का मौका मिला और मायूशी इस बात की ..कि वह चाह के भी अपने दिल की बात उसे नहीं बोल सका .....

घर पहुँचने के बाद प्रदीप उसी चारपाई पर लेट गया और आज के पुरे दिन भर के घटनाक्रम और दिव्या के बारे में सोचने लगा और कब न उसकी आँख लग गयी और खुले आसमान के निचे दिव्या के ही सपनो में खो गया...........
Deepak nautiyal©®



Comments

Ashish Nautiyal said…
और फिर दिव्या का व्याह हो गया।
Deepak Nautiyal said…
Nahi ji..Bilkul nahi..
Unknown said…
Apni love story h kya