खिड़की वाली भाग : 1


        

खिड़की वाली   PART : 01             भाग  :




अनिल की उम्र उस समय लगभग 19 या 20 की रही होगी ...उसी दौरान उसने अपनी बारवीं की परीक्षा बमुशकिल पास कर  किसी तरह से कॉलेज में दाखिला ले हि लिया था| पढ़ाई में बिलकुल सामान्य होने के बावजूद भी उसने बारवीं में साइंस ले  रखी थी ....चूँकि  वह तो आर्ट साईड की तरफ जाना चाहता था लेकिन आस पड़ोस के कुछ तेज पढाकुवों की वजह से उसे भी अपने घरवालों के दबाव के कारण साइंस लेनी पढ़ी थी ... वेसे ये दबाव आगे चल के काफी भारी पड़ने वाला था उसके ऊपर...|
 आख़िरकार न चाहते हुए भी अनिल साइंस रूपी विशाल और अनेकों भुजावों वाले असुर के नुकीले पंजों में फंस चुका था जिसके भयानक मुख से  कई प्रकार के खतरनाक रसायन टपक रहे थे ,जहाँ भी गिरते वहीँ फफोला कर देते...वो रसायन अनिल को हर रोज हर पल अपने उपर गिरते हुवे महसूस होते  .. उसके पास अब कोई चारा न था ..वो बोलते हैं न की “मरता क्या न करता“.....बस यही हाल अनिल का भी था ..
अनिल रोज कॉलेज आता और और कभी भी कोई क्लास मिस नहीं करता ,,,ये उसकी बहुत बड़ी खूबी थी ...लेकिन रोज क्लास अटेंड करने का कारण उसकी पढ़ाई के प्रति लगाव नहीं बल्कि शोर्ट अटेंडएंस (कम हाजिरी) का डर था .. क्यूँ की कहीं न कहीं वो यह जानता था की यदि किसी तरह से वो रट्टा मर के पास हो भी जायेगा लेकिन कम हाजिरी की वजह से कहीं उसे परीक्षा में ही नहीं बेठने दिया गया तो तेल लगा लठ घर में उसका बेसब्री से इन्तजार करेगा |
खैर इसी तरह से दिन बीतते गए और अनिल की भी थोड़ी बहुत पकड़ भी बनने लगी थी विज्ञान के विषयों पर ...उसकी ही क्लास में एक और लड़का पढता था सुरेश....  अभी कुछ दिन पहले ही दोनों की जान पहचान और फिर उसके बाद  दोस्ती हो गयी ...दोनों लास्ट की बैंच पर बैठा करते थे और पढ़ाई में अपने आप को एक दुसरे से तेज समझते थे.....लेकिन एसा कुछ था नहीं |
परीक्षाओं के दिन नजदीक आने लगे थे और अनिल  की दिल की धड़कने डर के मारे सातवें आसमान को छू रही थी , किसी तरह से बस छाती की पसलियाँ उन्हें अंदर संभाले हुए थी , नहीं तो वो धड़कने छाती फाड़कर आसमान से होते हुवे सीधे अन्तरिक्ष में जा के ही रुकते |
उस रोज सुबह से ही हलकी बरसात हो रही थी, बादल छाये हुए थे ,  जिस कारण हलकी ठण्ड का भी एहसास हो रहा था, .परीक्षा शुरू होने में अभी भी एक हफ्ता बाकी था , अनिल को सुरेश के घर  परीक्षा सम्बंधित कुछ किताबें और नोट्स वगेरह लेने जाना था लेकिन बारिस की वजह से वह थोडा लेट हो गया लेकिन किसी तरह से वह शाम तक  सुरेश के घर पहुँच ही गया क्यूँ की सवाल परिक्षावों का जो था |
अनिल के सुरेश के घर पहुँचने के कुछ देर बाद बारिस कुछ देर के लिए बंद हुई तो दोनों चाय का कप हाथ में लेकर के ऊपर छत पर आ गए ,  क्यूँ की बारिस के कारण घर में बहुत देर से बिजली भी गुल थी ...सुरेश यहाँ किराये के कमरे में रहता था क्यूँ की वह यहाँ केवल कॉलेज पढने के लिए ही आया था , अपना घर तो उसका गावं में था कहीं ....
दोनों दोस्त छत पर बैठ गप्पें मारते हुए चाय की चुस्कियां ले ही रहे थे तो अचानक अनिल को सडक के उस पार बड़े से तीन मंजिला मकान के दूसरी मंजिल के सड़क की तरफ वाले कमरे की खिड़की पर कुछ हलचल सी नजर आई ...चूँकि खिड़की कांच की थी  इसलिए बाहर की तरफ से बारिस के कारण भीगी होने से धुंधली हो गयी थी बावजूद जिसके भी  अनिल को लगा की कोई वहां से उनकी तरफ झाँक रहा है और अनिल की नजर पड़ते ही अचानक से वह साया तुरंत गायब हो जाता ....अनिल चुपके से फिर वहां देखता तो फिर से वही हलचल होती ...अनिल कुछ समझ नहीं पा रहा था और फिर उसने सुरेश को उस खिड़की की और इशारा किया ओर कहा “ ओये सुरेश वहां से कोई बहुत देर से झाँक रहा है यार ...जब उस से नजर चुराता हूँ तो वह झांकता है और नजर मिलते ही गायब हो जाता है , है क्या बला है ये ???”   फिर तुरंत  सुरेश ने भी वहां देखा और लगातार कुछ देर तक वहां देखता ही रहा लेकिन उसके बाद वहां से वह हलचल न जाने कहाँ गायब हो गयी ......सुरेश कुछ समझ नहीं सका और अनिल की बातों पे विश्वास उसे आया नहीं और कहा.. “क्या है वहां कुछ भी तो नहीं , मुझे तो कुछ भी नहीं दिखा ,  लगता है तुझे भ्रम हुवा है , कल रत लगता है कुछ ज्यादा ही पढ़ लिया तूने ,शायद तुझे आराम की जरुरत है | सुरेश ने अनिल का मजाक उड़ाते हुए कहा ... लेकिन  अनिल को अपनी आँखों पर पूरा भरोसा था लेकिन उसने उस बात के बारे में सुरेश से और बहस करना मुनासिब न समझा और कहा  ..चल ठीक है सुरेश मै चलता हूँ इस से पहले की फिर से बारिस आये मै निकलता हूँ ,,वेसे भी मेरे पास छाता नहीं हैं और घर जाकर तयारी भी तो करनी है पेपर की .........”  यह कहता हुआ अनिल अपने  बगल में छत की दीवार पर रखी किताबों और नोट्स  को उठता हुआ  वहां से निकल गया और कुछ देर बाद अपने घर पहुँच गया | रात को कुछ देर पढ़ाई करने के बाद जब वह सोने के लिए बिस्तर पर लेटा तो उसकी आँखों में वो वाक्या मंडराने लगा ...और खुद से कहने लगा “ कोई न कोई तो था जरुर वहां ..था तो वो कोई इंसान , अब ये पता नही की नर था या मादा “   यही मंथन करते करते कुछ देर बाद अनिल  बायीं और  करवट ले के लेट गया और कब न जाने नींद के आगोश में चला गया ...|
सुबह उठा तो वह कल का वो वाकया लगभग भूल ही चुका था ...और उठ कर नाश्ता करने के बाद तयार होके कॉलेज की तरफ निकल गया .. उस समय अनिल के पास एक स्कूटर हुआ करता हलके हरे रंग का ,उसी  में वह 20 रूपए का पेट्रोल डलवा कर कभी कभी कॉलेज चला जाया करता था ..लेकिन उसकी जेब में आज 20 रूपए न होने के कारण स्कूटर की टंकी में हड़ताल थी जिस वजह से उसे सवारी की गाडी से ही कॉलेज जाना पड़ा था | कॉलेज के गेट में उतरते ही उसने देखा की सुरेश उसका बहुत देर से वहीँ पे इन्तजार कर रहा था और उसके चहरे से एसा लग रहा था जेसे की वह कोई बहुत ही महत्वपूर्ण बात बोलने के लिए छटपटा रहा है और मेरे गाडी से निचे उतरने का इन्तजार कर रहा है ,,,एक जल्दीबाजी सी दिख रही थी उसकी आँखों में ...अनिल को भी लगा की शायद कुछ ख़ास ही होगा तभी ये इतना फडफडा रहा है |
अनिल गाडी से उतरने के बाद किराया देने लगा ,तब तक सुरेश वहीँ उसके पास पहुँच गया और बोलने लगा ..ओये साले एक ख़ास बात है तेरे लिए सुन तो  ... अनिल ने किराये के लिए जेब से पेसे निकालते हुवे  हुए झुंझला के सुरेश को रोकते हुए कहा ....अबे इतनी भी क्या हड़बड़ी है रुक तो किराया तो देने दे पहले “ .....यह सुन कर सुरेश ने अपने जज्बातों पे बड़ी मुश्किल से काबू किया और अनिल के किराया देने तक के लिए अपना मुह बंद रखा ....   जेसे ही अनिल किराया देके पीछे मुडा तो झट से सुरेश ने अपनी अधूरी बात पूरी की “ अबे साले तेरे तो मजे आ गए ....पार्टी चाहिए साले पार्टी ...”  यह सुन के अनिल थोडा सोच में पड़ा और फिर कहा   “किस बात की पार्टी बे , पहले बात क्या है ये तो बता ?”   तुरंत सुरेश लपक कर बोला “ अबे जब तू कल मेरे कमरे में आया था न किताब लेने , तो तू कहा रहा था न की सामने की खिड़की से कोई झाँक रहा है ? मुझे उसके बारे में पता लग गया “   यह सुन कर अनिल के कान खड़े हो गए और और उत्तर जानने के लिए लालायित होकर बोला ..” क्या पता चला ? कोन था वो खिड़की पे “....... तुरंत सुरेश बोला ..” अबे वो था नहीं बल्कि थी.... वो एक लड़की ,है जिसका नाम डिंपल है “  यह सुनकर अनिल थोडा हैरान हुआ लेकिन उस हैरानियत के पीछे की उत्सुकता भी उसके चेरे पर साफ़ साफ़ झलक रही थी ... और तपाक से बनावटी अनजान बनकर बोला ....  कोन डिम्पल?... मै नहीं जनता किसी डिंपल डूम्पल को, लेकिन ये बता वो झाँक क्यों रही थी चुपके से खिड़की से ?.... उसकी ये बात सुनकर सुरेश उसका हाथ पकड़ कर कॉलेज के मुख्यगेट से अंदर ले गया और दोनों कॉलेज के भवन के पहली मंजिल के किनारे सीड़ीयों के पास बने बालकोनी में ले गया और कहने लगा .... अबे मै जानता हूँ उसे , वो भी यहीं बी.कॉम कर यही है , पहला साल है उसका भी .. और असली बात तो ये है साले की वो तझे लाइक करती है ...  यह सुनकर अनिल एकदम से चौंका और कुछ सोचने लगा ...सोचते हुवे उसकी धुंधली पड़ी आँखों में एक चमक सी दिख रही थी, वह मन ही मन बहुत खुश हो रहा था .. और आखिर हो भी क्यों न . पहली बार उसी किसी लड़की ने पसंद जो किया था वो भी खुद सामने से बिना कोई मेहनत किये ..वरना इस से पहले तो उसे ही अपनी तरफ से जद्दोजहद करनी पड़ती थी और रिजल्ट भी हमेसा शून्य ही रहता था ..... थोड़ी देर सोचने के बाद अनिल ने कहा .. अबे तुझे कैसे पता की वो मुझे लाइक करती है ? तू कहीं मजाक तो नहीं कर रहा मुझसे ?....  उसकी यह बात सुनकर सुरेश थोडा झुंझलाते हुए बोला .. अबे मै क्यूँ मजाक करूँगा तुझसे , कोन सा तू मेरी बीबी का भाई है ... डिंपल ने खुद मुझे ये बात बताई की तू उसे अच्छा लगता है ......
अभी तक अनिल को इस बारे में जो भी ग़लतफहमी थी वो सुरेश की इस बात ने दूर कर दी थी | इसी बीच क्लास का समय भी हो गया था  और दोनों क्लास में अंदर अपनी नियत जगह पर बैठ गए ,जो की यक़ीनन लास्ट बेंच हि थी |
अनिल का ध्यान क्लास में अब कहाँ लगने वाला था , उसकी आँखे खुली तो थी लेकिन सामने का सारा दृश्य धुंधला होने लगा था और वो सिर्फ डिंपल के बारे में ही सोच रहा था ..वेसे उसने अभी तक डिंपल को देखा नहीं था सामने से , फिर भी वह कल्पनावों में ही उसकी अलग अलग तस्वीर बनाने लगा| वह डिंपल के ख्यालों में खोया ही हुवा था की अचानक उसके चेहरे पर एक धीमा , लेकिन नुकीला प्रहार हुवा , जिसने उसको ख्यालो के अर्श से निकाल  कर हकीकत के फर्श पर पटक दिया ... वो नुकीली वस्तु  वहां पढ़ा रहे टीचर के हाथों से छूटा हुवा चौक नुमा राकेट था जो सिधे अनिल के चेहरे के ऊपर लैंड हुवा . और सामने से आवाज आई ..  हेल्लो मिस्टर ...कहाँ ध्यान है तुम्हारा ?? सीधे बैठो ,नहीं तो क्लास से बहार निकाल दूंगा....... यह वहां पढ़ा रहे टीचर की धमकी भरे स्वर थे ..यह सुनकर वह तुरंत सीधे होकर बैठ गया ..और ध्यान आगे लगाना शुरू कर दिया ... कुछ देर बाद क्लास ख़त्म हुई ....उस दिन की बाकि क्लास में भी अनिल का वेसा ही हाल रहा था ....आखिर कॉलेज खत्म हुवा और सभी क्लास से बहार निकलने लगे ...और अपने अपने घर की तरफ रवाना हो गए ....... सुरेश और अनिल भी अपना अपना रास्ता पकडकर बाकियों की तरह वहां से चलते बने घर की और|

दीपक नौटियाल 

भाग दो यहाँ पढ़े..

उम्मीद है आपको कहानी का यह भाग जरुर पसंद आया होगा ......शेयर जरुर करें ...









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