खिडकी वाली :: भाग 2
खिड़की वाली :: भाग 2
भाग एक यहाँ पढ़े..
उस दिन अनिल घर पहुंचकर भी डिंपल के ही बारे में सोच ही रहा था...लेकिन उसे डिंपल से ज्यादा परीक्षा के बारे में सोचने की आवश्यकता थी , जो की उसका बेडा पार लगाने वाली थी ..... लेकिन इसका ठीक उल्टा हो रहा था ...अनिल जब भी किताब पढने के लिए बैठता तो ना चाहते हुए भी उसका ध्यान घूम फिर के डिंपल की और ही चला जाता जिस वजह से वह कभी कभी तो खीज भी उठता था और झुंझला कर किताब बंद कर देता .... और मन ही मन में बडबडाता .. ………ये डिंपल नहीं कराएगी तुझे परीक्षा में पास ...कण्ट्रोल अनिल कण्ट्रोल ..... और खुद को समझाते हुवे फिर से किताब खोल कर पढने की कोशिश करता लेकिन हर वक़्त असफल रहता ... बड़ी जद्दोजहद के बाद दो या चार अक्षर मात्र वह रट सका और किताब को सीने के ऊपर रख कर ही न जाने कब नींद के आगोश में चला गया ..
दुसरे दिन जब वह कॉलेज में सुरेश से मिला तो उन दोनों के बीच में डिंपल के बारे में कोई भी बात नहीं हुई. शायद इसिलए की परीक्षा बिलकुल सर पर खड़ी थी और वो दोनों फिलहाल किसी और चीज में अपना ध्यान नहीं लगाना चाहते थे ...कुछ देर तक दोनों की पढ़ाई लिखाई की बात चलती रही .. इस गुफ्तगू के दौरान अनिल के मन में चाय पीने की इच्छा जागृत हुई और वो दोनों कॉलेज के गेट के बाहर ही एक खोखे में बैठ गए ..वेसे वहाँ आस पास बहुत सी बड़ी बड़ी दुकाने भी थी , लेकिन बहुत से कॉलेज के लड़के वहीँ उस खोखे पे ही चाय पीना पसंद करते थे कारण क्या था पता नहीं ...लेकिन शायद बड़ी दुकानों के काले और मोटे रसोइयों के हाथ से बनी चाय पीने के बजाय लोग उस छोटे से खोखे में बैठकर उस गौरे और सुंदर हाथों वाली भाभी के हाथ से बनी चाय पीना पसन्द करते हों ... और बीच बीच में अगर वो कभी कभार किसी की तरफ प्यार से देख भर भी ले तो चाय के पैसे भी वसूल हो ही जाते थे | अनिल ने चाय की घूंट मारते हुवे सुरेश से कहा ... यार अगर मुझे कभी तेरे साथ कॉलेज के बाद बात करनी हो तो केसे कर सकता हूँ .. तेरे पास कोई फ़ोन या मोबाइल वगेराह है ?? सुरेश ने चाय का कप निचे रखते हुए कहा .. वेसे मेरे पास एक मोबाइल नम्बर तो है लेकिन वो मेरा नहीं है .. ...
. अनिल झट से चौकते हुवे बोला ..तो फिर किसका है ?? फिर थोडा लम्बी सांस भरते हुवे सुरेश ने कहा की .....
....दरअसल में वो नम्बर डिंपल का है , उस पे कॉल कर के तू मेरे से बात कर सकता है ... चूँकि सुरेश और डिंपल एक दुसरे के पडोसी थे और उनका एक दुसरे के घर भी कभी कभार आना जाना लगा रहता था तो इसी वजह से दोनों में थोड़ी बहुत जान पहचान भी थी | अनिल यह सुनकर उस से नम्बर लेने की जिद करने लगा यह सोचकर की सुरेश को फ़ोन करने के बहाने ही सही एक बार डिंपल की आवाज तो सुन लूँगा......आखिर सुरेश ने डिंपल का मोबाइल नम्बर अनिल के सुपुर्द कर दिया ,, अनिल ने झट से अपने बेग से एक नोटबुक निकल कर लास्ट पेज के एक कोने में नम्बर नोट किया और वापिस बैग में रख दिया ...अनिल के लिए अब इस सामान्य से बैग की कीमत कई गुना बढ़ गयी थी ..उसके अंदर डिंपल का नम्बर जो रखा हुआ था संभाल कर .......कॉलेज से घर जाते हुए अनिल ने अपने बैग को बिलकुल अपने सीने से लगाया हुवा था ...यह सोचकर की कहीं कोई चोर उचक्का छीनकर न भाग जाये ... अगर बैग कोई छीन भी लेता लेकिन उसके अंदर की नोट बुक वापिस कर दे... आखिर उसमे डिंपल का नम्बर जो लिखा था ..... मतलब घर जाते जाते आलम ये था की ... बैग जाए पर नम्बर न जाए ...
घर पहुँचने के बाद तुरंत अनिल ने बैग से वह नोटबुक निकाली जिस पे डिंपल का फ़ोन नम्बर लिखा हुवा था ....और उस नम्बर को बड़े प्यार से हर तरफ से निहारने लगा ओर मन ही मन बहुत खुश भी होने लगा था क्यूंकि अब उसे डिंपल तक पहुँचने की चाबी जो मिल गए थी ..... अब तो अनिल किसी भी और चीज में कुछ ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था , क्यूँ की उसकी सुईं तो केवल अब डिंपल पर ही अटक गयी थी.....
वह उस रात को ठीक से सो नहीं पाया जब भी नींद खुलती तो तकिये के निचे रखे हुए नोटबुक में लिखे डिंपल के नम्बर को देखता और कुछ देर बाद फिर से सोने की कोशिश करता ... .. एक बात तो साबित हो गयी थी की... बहुत ज्यादा ख़ुशी और बहुत ज्यादा दुःख सच में लोगों की नींद हराम कर देता है.. और यहाँ तो अनिल की ख़ुशी छत फाडकर बाहर निकल रही थी .... सारी रात आँखों ही आँखों में काटने के बाद कुछ देर में सुबह हुई तो अनिल की आँखे हलकी सी सूजी हुई थी ..ये तो होना ही था आखिर प्यार का साइड इफ़ेक्ट जो शुरू हो चुका ..ये तो महज एक शुरुवात ही थी ....
आज अनिल बहुत बेकरार था डिंपल को फ़ोन करने के लिए .. लेकिन परेशानी ये थी की उस समय बेचारे अनिल के पास मोबाइल फ़ोन नहीं था.... और वह किसी दोस्त के फ़ोन से भी उसे फ़ोन नहीं कर सकता था क्यों की उसे यह डर था की कहीं डिंपल का नम्बर किसी के फ़ोन में ही न रह जाए ..जो की सही नहीं होता .... और दूसरी बात यह की उस समय मोबाइल की कॉल भी बहुत महँगी हुवा करती थी तो कोई भी एक या दो मिनट से ज्यादा बात करने नहीं देता अपने फ़ोन से........ इन सब मुश्किलों का केवल एक ही हल था वो था अनिल की घर से थोड़ी दूर चौराहे में लगा पब्लिक टेलीफोन बूथ यानी की एस टी डी ..... अनिल कुछ सोचने के बाद घर से दस रूपए लेकर टेलीफोन बूथ में चला गया ...लेकिन वहां भी उस के साथ एक अच्छा खासा मजाक हो गया ... वो ये की उस टेलीफोन बूथ में जो लड़का काम करता था वो अनिल का ही जान पहचान का था और वो वहीँ अंदर ही बैठा था स्टूल के ऊपर बिलकुल फोन के बगल में ..एक और स्टूल वहां पर खाली पड़ा हुवा था जो की ग्राहक के लिए था ...अनिल जेसे ही बूथ के अंदर घुसा और उसने वहां अपने जानने वाले लड़के को देखा तो थोडा हिचकिचाया और सोचने लगा की इसके सामने केसे बात हो पायेगी ....वह लड़का अनिल की और देख के बोला ..... अरे अनिल भाई आओ .. फ़ोन करना है क्या कहीं ?...... अनिल थोडा झिझक के सोच के बोला ..... हाँ यार करना तो था फ़ोन .... यह सुनकर वहां बैठे लड़के ने फ़ोन को सरका कर अनिल की और कर दिया और बोला .... लो अनिल भाई कर लो फ़ोन ... और यह कहकर रजिस्टर में अपना हिसाब किताब का काम करने लगा ......... वहीँ पास में रखे स्टूल पर बैठने के बाद अनिल ने अपने जेब से वो पर्ची निकाली जिस पर डिंपल का नम्बर लिखा हुआ था ...जो की वो अपनी नोटबुक से फाड़ कर साथ लाया था ... अनिल फ़ोन का रिसीवर उठाकर नम्बर मिलाने लगा ....नम्बर डायल करते वक़्त उसकी एक आँख वहां बेठे लड़के के ऊपर भी थी ....और मन ही मन में सोच रहा था की काश ये थोड़ी देर के लिए बाहर चला जाता तो मै आराम से अकेले में बात कर लेता ...... जेसे ही डिंपल के मोबाइल में घंटी गयी अनिल ने तुरंत रिसीवर निचे रख दिया ..और कुछ सोचने लगा ... मै डिंपल से बात क्या करूँगा ....केसे शुरुवात करूँगा बात करने की ...आज से पहले तो एसा कोई मौका आया नही कभी ...... वेसे भी उसे उसके दोस्त सुरेश का नाम ले के ही डिंपल को फ़ोन करना था ... फिर जैसे ही थोड़ी हिम्मत कर के फिर से अनिल ने नम्बर मिलाने के लिए रिसीवर उठाया तभी बाहर अचानक बारिस की तेज बौन्छार पड़ने लगी तो वहां बेठा लड़का तुरंत बाहर निकला और बाहार लगे प्लास्टिक के तिरपाल को ठीक करने लगा .... इस बीच अनिल को अकेले में कुछ समय मिल गया , और उसने तुरंत नम्बर मिलाना शुरू किया ..कुछ ही देर में अनिल के कानो में जैसे जैसे घंटी बजने की आवाज आने लगी वैसे वैसे उसकी धड़कने भी तेज हो रही थी.. फिर अचानक से घंटी की आवाज एकदम से आनी बंद हो गयी और सामने से एक मधुर आवाज आई ... .. हेल्लो ........ अनिल कुछ बोल न सका , तो फिर से वहां से आवाज आई .. हेल्लो कोन है ?? बोलते क्यूँ नहीं हो ???... यह सुनकर अनिल ने कंपकंपाती आवाज में उत्तर दिया ... हाँ.... हेल्लो .. सामने से फिर एक सवाल और उसके कानो से टकराया .. कोन बोल रहा है ??? अनिल धीरे और डरते हुवे स्वर में बोला ....... वो मुझे मेरे दोस्त सुरेश ने ये नम्बर दिया था और कहा था की इस नम्बर के जरिये उस से बात हो जाएगी .. क्या आप सुरेश से मेरी बात करा सकते हैं.? मै उसका दोस्त अनिल बोल रहा हूँ..... इतना बोलने के बाद अनिल ने अपनी डर के मारे रुकी हुई सांस जोर से वापिस ली और खुद को थोडा सामान्य करने की कोशिस करने लगा......अनिल का इतना बोलने के बाद सामने से उत्तर आया ....अच्छा !!! तो आप अनिल हो ? लेकिन सुरेश तो अभी घर में नहीं है , शायद वो किसी काम से बाजार गया हुवा है.... यह सुनकर अनिल ने कहा ....ओह्ह्ह..... कोई बात नहीं मै बाद में बात कर लूँगा उस से... सॉरी आपको परेशान किया .... सामने से डिंपल थोडा मुस्कुराते हुवे बोली ....अरे इसमें परेशानी की क्या बात है ....अप जब चाहो फ़ोन कर सकते हो ... यह सुनकर अनिल थोडा खुश हुवा , उसके अंदर अब थोडा आत्मविश्वास आने लगा था और उसने तुरंत कहा .. जी शुक्रिया ....वेसे आप का नाम क्या है ?? (अनिल ने थोडा अनजान बनते हुवे कहा). सामने से आवाज आई .. मेरा नाम डिंपल है ...और अगर आपको बुरा न लगे तो मै आपसे एक बात कहूँ ?? यह सुनकर अनिल की आँखे चमकने लगी और एक साथ में डिंपल का सवाल जानने की उत्सुकता भी उसके चेहरे पर साफ़ साफ़ दिखाई रही थी , और उसने थोडा मुस्कुराकर जवाब दिया .......अरे नहीं नहीं . बुरा क्यूँ लगेगा ....आप बताओ क्या कहना है आपको ? फिर डिंपल थोडा संकुचाते हुवे बोली .... आप न......मुझे अच्छे लगते हो ..... यह सुनकर अनिल के चेहरे पर ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा ..मानो वो उस समय आसमान की सैर कर रहा हो ... प्रसन्नता की लहरें उसके मन में हिलोरे मार रही थी जोर जोर से ...आखिर एसा हो भी क्यूँ न ....पहली बार किसी लड़की ने अनिल को खुद सामने से पसंद किया था .... इतनी ज्यादा ख़ुशी एकदम से मिलने से अनिल की तो सांस ही अटक सी गयी थी , और बहुत कोशिश करने के बाद उसके मुह से केवल यही निकला .. थैंक यू ..... डिंपल फिर बोली .. अनिल आपका घर कहाँ पे है ?? अनिल ने तपाक से डिंपल को बिना इन्तजार करवाते हुवे पूरा घर का पता बता दिया , वो भी पिन कोड के साथ .... वैसे अति उत्तेजना में लोग ऐसे ही खुद पर से काबू खो देते हैं ..यही उत्तेजना एक दिन उसपर भारी जो पड़ने वाली थी ....यही सब अनिल के साथ हो रहा था ....उसे पता ही नहीं चल रहा था की क्या बोलना है और क्या नहीं .... इसी बीच फ़ोन के साथ लगे टाइमर के ऊपर उसका ध्यान गया तो चार मिनट खत्म हो चुके थे ...और उसके पास केवल दस रूपए ही थे , तो उसने जल्दी से बिना कुछ और बोले अचानक से फ़ोन निचे रख दिया , और बाहर खड़े टेलीफोन बूथ वाले लड़के को दस रूपए थमाये और घर की तरफ चल दिया ...
घर पहुँचने के बाद काफी देर तक अनिल के कानो में डिंपल की मधुर आवाज गूंज रही थी ...वह आँखे बंद कर के मन ही मन में आवाज को याद करके डिंपल की काल्पनिक तस्वीर बनाने की कोशिश कर रहा था ,, क्यूँ की अभी तक उसने डिंपल को देखा नहीं था .... उसका बहुत मन करने लगा था डिंपल को देखने का..... अनिल के दिल लीवर किडनी सब डिंपल के प्यार में घायल हो चुके थे ... और इन्तजार था बस एक मलहम का जो सिर्फ डिंपल ही लगा सकती थी .....
वेसे कुछ न कुछ एहसास तो डिंपल के अंदर भी था अनिल के लिए , उसे वो पसंद जो करती थी .. वेसे उसके अनिल को पसंद करने का एक ही कारण था जो की बहुत अजीबो गरीब था ...वो ये की डिंपल उन दिनों टीवी पर एक सीरियल देखा करती थी जिसका एक एक्टर उसे बहुत भाता था और वो सिर्फ उसी के कारण ही वो सीरियल देखा करती थी ....और कहीं न कहीं थोडा बहुत उस एक्टर की शक्ल इत्तफाक से अनिल से मिलती जुलती थी बस .... यही कारण था डिंपल के अनिल के प्रति आकर्षण का..... ......
लेकिन अनिल को उस सीरियल और उस एक्टर से दूर तलक कोई भी लेना देना नहीं था ... उसे तो बस डिंपल और अपनी लव स्टोरी को आगे बढ़ानी थी किसी भी तरह से ..
कुछ दिन इसी तरह से टेलीफोन बूथ से ही दोनों की बातें होने लगी थी ....जब कभी अनिल के पेसे ख़त्म हो जाते तो डिंपल ही टेलीफोन बूथ पर अनिल के लिए अपने मोबाइल से कॉल किया करती थी बिना बिल की परवाह किये ....दोनों का एक दुसरे के प्रति आकर्षण बढ़ता ही जा रहा था दिन प्रतिदिन .... हाँ ....वो आकर्षण ही था ..प्यार तो बिलकुल भी नहीं था ...क्यूँ नहीं था ? ये आपको आगे पता चल ही जायेगा .....लेकिन वो दोनों इसे प्यार ही समझ रहे थे....अब तो आलम ये था की डिंपल भी उस टीवी सीरियल को जिसमे उसे हीरो की जगह अनिल ही दिखता था , के सभी एपिसोड देखा करती थी यहाँ तक की एक ही एपिसोड भी कई कई बार .....
उस समय बहुत कम लोगों तक मोबाइल की पहुँच होती थी ...मोबाइल एक आकर्षण भी था उस समय.... और कुछ ही लोगों के पास मोबाइल होता था | यह सोचकर अनिल और भी खुश होता की जिस से वह प्यार करता है उसके पास भी मोबाइल है .....
डिंपल का जब मन करता अनिल से बात करने का तो वह उसी टेलीफोन बूथ में ही कॉल करती थी और टेलेफोन बूथ से लड़के से ही अनिल को बुलाने की रिक्वेस्ट करती ... ऐसा कुछ दिनों तक चला ...आखिर वो टेलेफोन बूथ वाला लड़का कितने दिन अनिल को बुलाने उसके घर आता .....
पिछले कुछ दिनों से दोनों की बात नहीं हुई , शायद परीक्षा की वजह से ....डिंपल का भी कॉल नहीं आया था पिछले कुछ दिनों से ..और ...अनिल ने ये समझ के कॉल नहीं किया की शायद परीक्षा की वजह से डिंपल व्यस्त होगी ..... दोनों के मन में यही विचार आ रहा था एक दुसरे के लिए .....आखिर कुछ दिनों में जैसे तैसे परीक्षा निपटी ...और आराम का समय शुरू हो गया था....
एक भरी दोपहर.....समय लगभग बारह और एक बजे के बीच अनिल अपने घर पे सो रहा था ..बाहर तेज धुप लगी हुई थी ..तभी बाहर से दरवाजा खड्खडाते हुवे आवाज आई .....अनिल भैया ... दरवाजा खोलो .... अनिल नींद से जगा और आँखे मसलते हुवे दरवाजा खोला तो .. बाहर पड़ोस का ही एक बच्चा खड़ा था .... अनिल ने झुंझला कर बच्चे से गुस्से में बोला .......क्या हुआ बे ..क्यूँ नींद ख़राब करने आ गया इतनी धुप में .... वह बच्चा डरते हुवे बोला .....भैया वो गेट के बाहर आपको कोई लड़की बुला रही है......... अबे सुन तो वो है कोन??.........अनिल कुछ और पूछना चाह रहा था लेकिन तब तक बच्चा वहां से भाग गया.... अनिल कुछ समय के लिए सोच में पड गया , की आखिर कौन हो सकती है जो मुझे बुला रही है वो भी इतनी भरी दुपहरी में ..... खैर अनिल ने वहीँ पास में टंगी हुई घर में पहनने वाली साधारण सी कमीज पहनी और बाहर पड़ी हवाई चप्पल पैरों में फंसाई और कमीज के बटन लगते हुवे मोहल्ले के बाहर गेट की और जाने लगा ........
भाग तीन यहाँ पढ़े..
उम्मीद है की आपको कहानी पसंद आ रही है ......धन्यवाद
दीपक नौटियाल



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